हवेली के उस बंद कमरे में वक्त जैसे ठहर गया था। बाहर सन्नाटा था, लेकिन कमरे के भीतर की हवा दोनों की गर्म साँसों से भारी हो चुकी थी। अर्जुन की मर्दाना खुशबू और मीरा के बदन की भीनी महक आपस में मिलकर एक ऐसा नशा पैदा कर रही थीं, जिससे बच निकलना अब नामुमकिन था। अर्जुन, जो इस पूरे प्रदेश का बेताज बादशाह था, आज अपनी ही एक कैदी... अपनी 'मलिका' के हुस्न के जाल में पूरी तरह उलझ चुका था।
मीरा बेड पर अर्ध-नग्न अवस्था में लेटी हुई थी। उसका ऊपरी हिस्सा अर्जुन के प्रेम और जुनून के निशानों से भरा हुआ था। उसकी आँखें अधखुली थीं, जिनमें हवस नहीं, बल्कि समर्पण का एक समंदर हिलोरे ले रहा था। अर्जुन उसके ऊपर किसी पहाड़ की तरह झुका हुआ था। उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो मीरा को जलाकर राख कर देना चाहती थी, और मीरा उस आग में जलने के लिए पूरी तरह तैयार थी।
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