हवेली के उस बंद कमरे में रात का सन्नाटा अब और भी गहरा और भारी हो चुका था। कमरे के भीतर की हवा में बारूद, महँगी शराब और जिस्मों की गर्मी का एक ऐसा मिश्रण था जो किसी को भी मदहोश कर दे। बाहर तैनात बंदूकों वाले पहरेदारों को क्या पता था कि जिस 'सकार' के नाम से पूरा प्रदेश थर-थर कांपता है, वह इस वक्त अपनी एक मखमली 'मलिका' के सामने अपनी हार और जीत के बीच खड़ा है।
अर्जुन बेड के सिरहाने से लगकर बैठा था। उसका सीना, जिस पर गोलियों और चाकुओं के पुराने निशान उसकी बहादुरी की दास्ताँ कह रहे थे, तेज़ सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके चेहरे पर एक ऐसी हिंसक चमक थी जो सिर्फ़ युद्ध या बिस्तर पर ही नज़र आती थी। मीरा, जो अब तक उसके जिस्म के ऊपरी हिस्से को अपनी कोमलता से सहला रही थी, उसके घुटनों के पास फर्श पर बैठी थी।
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