हवेली के बाहर काली रातों का पहरा था और अंदर उस बंद कमरे में एक ऐसा तूफान उमड़ रहा था, जो अब सब कुछ तहस-नहस करने पर आमादा था। हवा में सस्पेंस इतना गहरा था कि सांस लेना भी दूभर था। अर्जुन शेखवत, जिसके एक इशारे पर पूरा प्रदेश कांपता था, आज अपने जीवन की सबसे बड़ी जीत... या शायद सबसे बड़ी हार की दहलीज पर खड़ा था।
कमरे की मद्धम रोशनी मीरा के पसीने से तर-बतर जिस्म पर पड़ रही थी। वह अर्जुन के सामने पूरी तरह नग्न और बेबस थी, जैसे कोई बलि का बकरा किसी खूंखार शिकारी के सामने खड़ा हो। लेकिन मीरा की आँखों में खौफ नहीं, बल्कि एक अजीब सी दीवानगी थी। अर्जुन ने उसके दोनों पैरों को फैलाकर उनके बीच अपनी जगह बनाई। उसका वज्र जैसा भारी शरीर मीरा की नाज़ुक देह को बेड में धंसा रहा था।
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