बिस्तर की सलवटें और कमरे की भारी हवा गवाह थी कि मर्यादा का बांध अब पूरी तरह टूट चुका था। विक्रम, जो अब तक रिया के वक्षों और कूल्हों के साथ अपनी वहशत का खेल खेल रहा था, उसकी भूख अब और भी ज़्यादा गहरा गई थी। उसे रिया के जिस्म की उस सबसे गुप्त और वर्जित जगह को फतह करना था, जहाँ से उसकी जवानी का झरना बह रहा था।
विक्रम ने रिया के दोनों पैरों को टखनों से पकड़ा और उन्हें इतनी बेरहमी से फैला दिया कि रिया का निचला हिस्सा पूरी तरह बेपर्दा हो गया। रोशनी की हल्की किरण जब रिया की उस नन्ही और गीली 'पुसी' (Pussy) पर पड़ी, तो विक्रम की आँखों में एक जानवर जैसी चमक आ गई। वहां की नमी और गुलाबी रंगत देखकर विक्रम का गला सूखने लगा।







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