बिस्तर पर रिया की हालत किसी पस्त हुई सिपाही जैसी थी। उसका पूरा बदन पसीने और विक्रम के दिए हुए निशानों से लथपथ था। वह हाँफ रही थी, उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी और उसकी आँखों में एक ऐसी प्यास थी जो अभी भी अधूरी थी। विक्रम ने बिस्तर के किनारे बैठकर अपनी उस धधकती हुई मर्दानगी को देखा, जो अभी भी लोहे की तरह सख्त और बेकाबू थी।
विक्रम ने अपनी उँगलियों से रिया के माथे पर आए पसीने को पोंछा। उसकी आँखों में हवस तो थी, पर साथ ही एक खूंखार समझदारी भी। रिया ने विक्रम का हाथ पकड़कर उसे अपनी उस गीली और सूजी हुई 'पुसी' (Pussy) की ओर ले जाने की कोशिश की।







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