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Chapter 1 Joya ki masumiyat

लखनऊ की सुबह अपनी पूरी नज़ाकत के साथ नमूदार हो चुकी थी। परिंदों की चहचहाहट और दूर कहीं मस्जिद से आती अज़ान की गूंज ने फिज़ा में एक पाकीज़गी भर दी थी। 'हवेली-ए-खास' के एक सजे-धजे कमरे में, मखमली पर्दों के पीछे से सूरज की एक किरण ने झाँकने की हिमाकत की।

झिलमिलाती रजाई के बीच से एक मासूम सा चेहरा बाहर निकला। ज़ोया ने अपनी बड़ी-बड़ी कत्थई आँखें मलीं और एक लंबी अंगड़ाई ली। उसके चेहरे पर वह मासूमियत थी जो केवल उन लोगों के पास होती है जिनके दिल में कोई मैल नहीं होता।

"गुड मॉर्निंग ज़ोया! आज तुम कल से पाँच मिनट जल्दी जागी हो, शाबाश!" उसने खुद से ही बातें करते हुए आईने में अपनी सूरत देखी और खिलखिलाकर हँस पड़ी।

ज़ोया—इस हवेली की लाड़ली, चंचल, थोड़ी शरारती और दिल की बेहद साफ। उसने जल्दी से वज़ू किया, नमाज़ अदा की और एक गुलाबी रंग का अनारकली सूट पहना जिस पर बारीक चिकनकारी का काम था। अपने बालों को एक ढीली चोटी में बांधकर वह सीढ़ियों से उतरते हुए नीचे की ओर भागी।

जैसे ही ज़ोया डाइनिंग हॉल के करीब पहुँचे, उसे बर्तनों के टकराने की आवाज़ और अपनी अम्मी, यानी 'ज़ीनत बेगम' की बुलंद आवाज़ सुनाई दी।

"अरे ओ नवाबज़ादी! आ गईं आप? सूरज सर पर आ गया है और मोहतरमा अब तशरीफ ला रही हैं," ज़ीनत बेगम ने हाथ में कलछी लिए रसोई से बाहर निकलते हुए कहा। उनकी आँखों में बनावटी गुस्सा था, पर लहजा सख्त था।

"अम्मी... वो बस आँख लग गई थी," ज़ोया ने मासूमियत से अपना कान पकड़ा।

"चुप रहो! क्या होगा तुम्हारा? न कोई काम सीखा, न सलीका। दिन भर बस तितलियों की तरह उड़ना आता है। कल को पराए घर जाओगी तो लोग क्या कहेंगे कि ज़ीनत ने अपनी बेटी को कुछ नहीं सिखाया? इतनी आलसी लड़की मैंने आज तक नहीं देखी!" ज़ीनत बेगम ने उसे डांटना शुरू किया।

अभी ज़ोया का चेहरा उतरने ही वाला था कि पीछे से एक रेशमी और ममता भरी आवाज़ गूंजी।

"बस कीजिए अम्मी! मेरी बच्ची को और मत डांटिए।"

यह 'मरियम' थीं, ज़ोया की बड़ी जठानी, जो उसे अपनी बेटी की तरह चाहती थीं। मरियम ने ज़ोया को अपने गले से लगा लिया और ज़ीनत बेगम की ओर मुड़कर बोलीं, "खबरदार जो मेरी ज़ोया को कुछ कहा तो। अभी तो इसकी खेलने-खाने की उम्र है, सारा काम तो हम कर ही लेते हैं। क्यों मेरी जान?"

ज़ोया ने मरियम के गले लगकर अपनी अम्मी को चिढ़ाया। "देखा अम्मी? सिर्फ बड़ी अम्मी (मरियम) ही मुझसे प्यार करती हैं। आप तो बस मुझे डांटने का बहाना ढूँढती रहती हैं।"

ज़ीनत बेगम ने अपना सिर पीट लिया। "हाँ-हाँ, सबने बिगाड़ रखा है इसे। देखना एक दिन यह हमारे सिर पर चढ़कर नाचेगी।"

तभी हॉल में 'हशमत साहब' (ज़ोया के बड़े अब्बू) दाखिल हुए। उनके हाथ में अखबार था और चेहरे पर एक रौबदार मुस्कान।

"क्या हो रहा है यहाँ? सुबह-सुबह मेरी लाड़ली को कौन परेशान कर रहा है?" हशमत साहब ने कड़क आवाज़ में पूछा, पर उनकी आँखें ज़ोया को देख रही थीं।

ज़ोया दौड़कर उनके पास गई और उनके कुर्ते की आस्तीन पकड़कर झूलने लगी। "बड़े अब्बू! देखिए ना, अम्मी मुझे कितना बुरा-भला कह रही हैं। आप ही बताइए, क्या मैं आलसी हूँ?"

हशमत साहब हँस पड़े। "बिल्कुल नहीं! तुम तो इस घर की रौनक हो।" उन्होंने अपनी जेब से एक बड़ी सी सिल्क चॉकलेट निकाली और ज़ोया की हथेली पर रख दी।

ज़ोया की आँखें खुशी से चमक उठीं। "थैंक यू बड़े अब्बू! आप दुनिया के सबसे अच्छे इंसान हैं।"

तभी ज़ोया के अपने अब्बू, 'अनवर साहब' भी वहाँ आ पहुँचे। ज़ोया ने फौरन उन्हें घेरा। "अब्बू! बड़े अब्बू ने तो दे दी, अब आपकी बारी। मुझे एक और चाहिए!"

अनवर साहब ने अपनी पत्नी (ज़ीनत) की ओर देखा जो गुस्से से उन्हें घूर रही थीं, फिर चुपके से अपनी जेब से एक और चॉकलेट निकालकर ज़ोया को पकड़ा दी। "लो ज़ोया, पर अपनी अम्मी को मत बताना।"

"मैंने देख लिया है अनवर साहब! आप सब मिलकर इस लड़की को इतना बिगाड़ रहे हैं कि यह किसी की बात नहीं सुनेगी," ज़ीनत बेगम ने झुंझलाते हुए कहा। "अब चलिए, चॉकलेट का तमाशा खत्म हुआ हो तो नाश्ते की मेज़ पर आइए। सब ठंडा हो रहा है।"

हवेली का बड़ा सा दस्तरख्वान स सज चुका था। पराठे, कबाब, मलाई और चाय की महक से पूरा हॉल महक रहा था। सब लोग हँसते-हँसते नाश्ता कर रहे थे, लेकिन ज़ोया के मन में एक बात रह-रहकर आ रही थी।

उसे पता था कि इस हवेली की खुशियों के पीछे एक ऐसा साया भी है जिससे सब डरते हैं। वह शख्स जो इस खानदान का सबसे बड़ा वारिस है, पर जिसका दिल पत्थर का है। वह शख्स जिसे लोग 'शाह' कहते हैं।

"अब्बू... क्या भाईजान आज वापस आ रहे हैं?" ज़ोया ने अचानक पूछा।

ज़ोया के सवाल पर पूरे दस्तरख्वान पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। हशमत साहब के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई और उन्होंने संजीदगी से सिर हिलाया। "हाँ... शाहनवाज़ (Shah) का फोन आया था। वह आज शाम तक शहर पहुँच जाएगा।"

ज़ोया ने एक ठंडी साँस ली। उसका चंचल मन थोड़ा सहम गया। उसे याद था कि 'शाह' का मतलब है—कम बोलना, सख्त कायदे और बेपनाह खौफ। वह इस घर का वह हिस्सा था जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता था। वह जितना हैंडसम था, उतना ही दिल से पत्थर।

"नाश्ता करो ज़ोया। उनके आने से पहले तुम्हें अपनी सारी शरारतें समेटनी होंगी," मरियम ने धीमे से उसके कान में कहा।

ज़ोया ने चुपचाप अपना पराठा तोड़ा। उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि आज शाम जो 'शाह' इस हवेली की दहलीज पर कदम रखने वाला है, वह उसकी ज़िंदगी की मासूमियत को हमेशा के लिए एक हसीन और खौफनाक आग में बदलने वाला है।

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