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Chapter 2 cousin ke ane ki taiyari

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prachi76011

सुबह की वह धूप, जो थोड़ी देर पहले खिलखिला रही थी, अब अचानक ही कुछ गंभीर सी लगने लगी थी। 'हवेली-ए-खास' में हलचल तेज़ हो गई थी। हर कोने की सफाई दोबारा की जा रही थी, मेज़ पर शाहनवाज़ की पसंद के पकवान सजाए जा रहे थे और घर के नौकरों के चेहरों पर एक अजीब सा तनाव था। जैसे किसी बड़े तूफान के आने की आहट हो।

ज़ोया, जो अपनी चॉकलेट का लुत्फ उठा रही थी, अपनी अम्मी ज़ीनत बेगम की हड़बड़ाहट देख कर हैरान थी। ज़ीनत बेगम बार-बार उसके पास आ रही थीं और उसके दुपट्टे को ठीक कर रही थीं।

"ज़ोया, मेरी बात कान खोलकर सुन ले," ज़ीनत बेगम ने उसका हाथ पकड़कर उसे एक कोने में ले जाते हुए कहा। उनका लहजा इतना संजीदा था कि ज़ोया की शरारत हवा हो गई।

"क्या हुआ अम्मी? आप इतना परेशान क्यों हैं?" ज़ोया ने मासूमियत से पूछा।

"शाहनवाज़ आ रहा है। देख बेटा, वह इस घर का बड़ा है, उसका रूतबा अलग है। जब वह सामने आए, तो अपनी यह चुलबुली बातें और बेमतलब की हंसी बंद रखना। उसके सामने ज़ुबान मत लड़ाना। वह अगर तुझे डांटे या कुछ कहे, तो सिर झुकाकर सुन लेना, पलटकर जवाब देने की हिमाकत मत करना। समझी तू?"

ज़ोया की भौहें तन गईं। वह अपनी अम्मी को उलझन भरी नज़रों से देखने लगी। "अम्मी! आप ऐसे क्यों बोल रही हैं? भाईजान ही तो हैं... मेरे बड़े भाई जैसे। कोई ज़ालिम या 'डेमन' थोड़ी ही हैं कि मैं उनसे डरूँ? और वैसे भी, मैं गलत क्या करती हूँ जो वह मुझे डांटेंगे?"

ज़ीनत बेगम ने एक ठंडी आह भरी। "वह किसी डेमन से कम नहीं है ज़ोया, जब उसका गुस्सा सातवें आसमान पर होता है। उसकी आँखों में देख पाना सबके बस की बात नहीं। बस मेरी खातिर, आज कायदे से रहना और उन्हें इज़्ज़त देना।"

ज़ोया ने कंधों को उचकाया। उसे अम्मी की बातें बहुत अजीब लग रही थीं। उसके लिए शाहनवाज़ बस एक बड़ा भाई था जो बरसों से बाहर था। वह उनकी मदद करने के लिए फूलों के गुलदस्ते सजाने लगी और मेज़ पर प्लेटें लगाने लगी, पर उसका मन बार-बार अम्मी की उन चेतावनियों पर जा रहा था।

सब कुछ तैयार हो चुका था। हवेली के बड़े गेट पर गार्ड्स की तैनाती बढ़ गई थी। ज़ीनत बेगम ने घड़ी देखी और घबराकर ज़ोया को आवाज़ दी।

"ज़ोया! जा जल्दी, जाकर तैयार हो जा। शाहनवाज़ किसी भी पल पहुँचते ही होंगे। ऐसा न हो कि वह अंदर आएं और तू इन बिखरे हुए बालों के साथ यहाँ घूम रही हो।"

ज़ोया ने चिढ़कर अपना पैर पटका। "अम्मी! हद है आपकी! मैं तैयार होने जा रही हूँ, पर आप तो ऐसे कर रही हैं जैसे मुझे कोई 'रिश्ते वाले' देखने आ रहे हों। भाई ही तो आ रहे हैं, कोई शहंशाह थोड़ी!"

वह बड़बड़ाती हुई सीढ़ियों से ऊपर अपने कमरे में गई। उसने एक गहरा मरून रंग का शरारा सूट निकाला। उसकी आँखों में काजल, कानों में भारी झुमके और हाथों में खनकती चूड़ियाँ। जब वह आईने के सामने खड़ी हुई, तो खुद को देखकर मुस्कुरा दी। वह वाकई बहुत हसीन लग रही थी, पर उसके दिल की धड़कनें न जाने क्यों बिना वजह तेज़ हो रही थीं।

उसने अपने दुपट्टे को सँभाला और कमरे से बाहर निकली। "अल्लाह! मैं तो लेट हो गई। पक्का भाईजान आ गए होंगे और अम्मी अब मेरा कचूमर निकाल देंगी," उसने खुद से फुसफुसाते हुए कहा और तेज़ी से सीढ़ियों की ओर भागी।

ज़ोया सीढ़ियों से उतर रही थी, उसका पूरा ध्यान अपने दुपट्टे और अपनी सैंडल को सँभालने में था। वह तेज़ी से मुड़ी और बिना सामने देखे कॉरिडोर की ओर लपकी।

"सॉरी अम्मी! मैं बस आ ही रही..." उसका जुमला अधूरा रह गया।

उसका जिस्म किसी पत्थर की मज़बूत दीवार से टकराया। ज़ोया का संतुलन बिगड़ गया और वह पीछे की ओर गिरने ही वाली थी कि दो फौलादी हाथों ने उसे कमर से जकड़ लिया। उसकी चूड़ियों की खनक पूरे शांत कॉरिडोर में गूंज उठी।

ज़ोया की साँसें अटक गईं। उसने धीरे से अपनी नज़रें ऊपर उठाईं।

सामने शाहनवाज़ खड़ा था।

छह फुट से भी ऊँचा कद, गठा हुआ जिस्म, और चारकोल ब्लैक सूट में वह साक्षात् खौफ का दूसरा नाम लग रहा था। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था—पत्थर जैसी ठंडी और तीखी नज़रे। उसकी आँखों में एक ऐसी वहशीियत और चमक थी जो ज़ोया ने पहले कभी नहीं देखी थी। वह उसे 'किंग' नहीं, बल्कि किसी सल्तनत का 'ज़ालिम सुल्तान' लग रहा था।

शाहनवाज़ की नज़रें ज़ोया के गुलाबी चेहरे पर ठहर गई थीं। ज़ोया, जो हमेशा सबकी आँखों में आँखें डालकर बात करती थी, आज न जाने क्यों उसकी नज़रें झुक गईं। उसे अपने वजूद में एक अजीब सा खौफ महसूस हुआ—एक ऐसा डर जो डराता भी था और अपनी ओर खींचता भी था।

शाहनवाज़ ने उसे छोड़ा नहीं। उसकी पकड़ ज़ोया की नाजुक कमर पर और भी सख्त हो गई। कॉरिडोर की खामोशी में केवल शाहनवाज़ की भारी साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

ज़ोया का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा वह बाहर आ जाएगा। वह कुछ बोलना चाहती थी, पर उसके गले से आवाज़ नहीं निकली। वह बस उसकी आँखों की उस स्याह गहराई में खो गई, जहाँ केवल अहंकार और एक अनकहा जुनून छिपा था।

"ज़ोया...?" शाहनवाज़ की भारी, गहरी और रूखी आवाज़ उसके कानों से टकराई।

उस एक लफ्ज़ ने ज़ोया के पूरे बदन में एक सिहरन पैदा कर दी। उसे अम्मी की बातें अब समझ आ रही थीं। यह शख्स वाकई कोई साधारण इंसान नहीं था; यह वह तूफान था जिसे वह अपनी मासूमियत से थामने की कोशिश कर रही थी।

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