हवेली की फिज़ा में आज मोगरे और संदल की महक कुछ ज़्यादा ही गहरी थी। ज़ोया को उसकी अम्मी और मरियम जठानी ने मिलकर एक भारी सुर्ख लाल रंग के लहंगे में सजाया था। उस पर सोने के तारों का बारीक काम था, जो दीयों की रोशनी में ज़ोया के गोरे बदन पर बिजली की तरह चमक रहा था। उसकी आँखों में काजल, माथे पर झूमर और हाथों में मेहंदी की वह महक थी जो एक दुल्हन की पहचान होती है।
"अम्मी... मुझे डर लग रहा है," ज़ोया ने अपनी अम्मी का हाथ पकड़ते हुए सिसक कर कहा। उसकी आँखों से एक कतरा आँसू ढलक कर उसके गाल पर आ गिरा।







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