कमरे में जल रही शमआ (मोमबत्तियों) की मद्धम रोशनी ज़ोया के लाल जोड़े पर नाच रही थी। शाहनवाज़ की गोद में बैठी ज़ोया को ऐसा लग रहा था जैसे उसका पूरा वजूद पिघलकर शाहनवाज़ के फौलादी जिस्म में समा जाएगा। शाहनवाज़ की नीली आँखों में आज वह खौफनाक कड़ाई नहीं थी, बल्कि एक ऐसी प्यास थी जो ज़ोया को जलाने के लिए काफी थी।
शाहनवाज़ ने बहुत ही नज़ाकत से ज़ोया की ठुड्डी को ऊपर उठाया। ज़ोया की पलकें बोझिल थीं, और उसके होंठों पर एक अजीब सी थरथराहट थी।







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