कॉलेज की थका देने वाली क्लासों के बाद, दोपहर की सुनहरी धूप अब ढलने लगी थी। आराध्या अपनी बेंच पर बैठी अपनी नोटबुक के पिछले पन्ने पर पेन से उलझी हुई लकीरें खींच रही थी। उसने अनजाने में ही पन्ने के कोने पर एक बड़ा सा 'A' बना दिया था। जैसे ही उसे अहसास हुआ, उसने घबराकर उसे बुरी तरह काट दिया, जैसे वह अपनी भावनाओं को भी उसी तरह मिटा देना चाहती हो।
तभी रिया ने उसे टोका, "क्या हुआ आराध्या? कहाँ खोई हुई है? क्लास खत्म हो गई है, चल कैंटीन चलते हैं।"
"नहीं रिया, मेरा मन नहीं है। भैया बाहर इंतज़ार कर रहे होंगे," आराध्या ने अपना बैग समेटते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी। निशा के साथ सुबह का वो सीन अभी भी उसके दिमाग में किसी कांटे की तरह चुभ रहा था।
जब वह बाहर निकली, तो उसने देखा कि एमबीए ब्लॉक के बाहर आर्यन कुछ लड़कों के बीच खड़ा था। वह किसी प्रोजेक्ट को लेकर निर्देश दे रहा था। उसका अंदाज़ इतना प्रभावशाली (Commanding) था कि उसके सामने खड़े लड़के चुपचाप उसकी बात सुन रहे थे। यहाँ आर्यन एक 'अल्फा लीडर' था। उसकी आँखों में वो कोमलता नहीं थी जो घर पर होती थी, बल्कि एक ठंडी चमक थी।
आराध्या को दूर से खड़ा देख, आर्यन ने अपनी बात खत्म की और उसकी तरफ बढ़ा। "चलो, घर चलें?"
रास्ते भर कार में ज़्यादा बात नहीं हुई। आर्यन थका हुआ लग रहा था और आराध्या अपने अंदर के तूफ़ान को दबाने की कोशिश कर रही थी।
शाम की वो दहलीज और एक अनचाहा लम्हा
घर पहुँचकर आर्यन ने अपनी शर्ट के ऊपर के बटन खोले और सोफे पर ढह गया। "आराध्या, मैं थोड़ा आराम कर रहा हूँ, फिर डिनर का देखते हैं। तुम फ्रेश हो जाओ।"
आराध्या अपने कमरे में चली गई। दिन भर की उमस और कॉलेज की धूल ने उसे थका दिया था। उसने शावर लिया। गर्म पानी की बूंदों ने उसके जिस्म की थकान को तो कम कर दिया, लेकिन मन की व्याकुलता वैसी ही थी। शावर लेने के बाद, उसे अहसास हुआ कि वह अपने कपड़े बाहर ही भूल आई है। घर में कोई था नहीं, बस भाई नीचे सोफे पर था। उसने सोचा कि जल्दी से जाकर कपड़े ले आएगी।
वह सिर्फ एक सफेद तौलिये में लिपटी हुई बाथरूम से बाहर आई। तौलिया उसके बदन पर कसकर लिपटा हुआ था, जिससे उसके शरीर की बनावट साफ झलक रही थी। उसके गीले बाल उसकी पीठ पर बिखरे हुए थे और पानी की कुछ बूंदें अभी भी उसकी गर्दन से फिसलकर नीचे जा रही थीं।
उसी वक्त, आर्यन को याद आया कि उसे अपनी एक ज़रूरी फाइल आराध्या के कमरे में ही छोड़ दी थी। उसने बिना सोचे-समझे दरवाज़ा खोला और अंदर कदम रख दिया।
"आराध्या, वो मेरी फाइ—"
आर्यन के शब्द उसके गले में ही अटक गए। सामने का मंज़र देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। आराध्या, जो ड्रेसिंग टेबल के पास खड़ी थी, आर्यन को देखकर एकदम ठिठक गई। कमरे में एक सन्नाटा छा गया, जिसमें सिर्फ उन दोनों की तेज़ होती धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
आर्यन की नज़रें, जो हमेशा आराध्या को एक 'बच्ची' की तरह देखती थीं, आज जैसे अपनी राह भटक गईं। उसकी आँखें अनजाने में ही आराध्या के भीगे हुए कंधों, उसकी सुराहीदार गर्दन और तौलिये से उभरती उसकी देह की बनावट पर ठहर गईं। एक पल के लिए वह आर्यन नहीं, बल्कि एक मर्द था जो एक बेहद खूबसूरत औरत को देख रहा था। उसने अनचाहे ही उसकी पूरी बॉडी को स्कैन किया। उसके दिमाग में एक बिजली सी कौंधी।
आराध्या ने देखा कि आर्यन उसे कितनी गहराई से देख रहा है। वह शर्म से लाल हो गई थी, लेकिन उसके मन के एक कोने में एक अजीब सी 'जीत' का अहसास हुआ। उसे लगा कि आखिरकार उसने अपने भाई की आँखों में वो चमक देखी है, जिसका वह सालों से इंतज़ार कर रही थी।
अचानक, आर्यन को होश आया। जैसे किसी ने उसे गहरी नींद से झकझोर दिया हो। उसके चेहरे पर अपराधबोध (Guilt) के भाव आ गए। उसने अपनी नज़रें झुकाईं और बिना एक शब्द बोले, तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गया और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर दिया।
आराध्या बिस्तर पर बैठ गई। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसने अपने होंठों को दांतों तले दबाया। 'क्या भैया ने मुझे उस नज़र से देखा? हाँ, उनकी आँखों में वो सादगी नहीं थी। वो मुझे देख रहे थे... जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को देखता है।' इस ख्याल ने उसे एक अजीब सी खुशी से भर दिया। उसे लगा कि शायद आर्यन के मन में भी उसके लिए कुछ है, जिसे वह दबा रहा है।
दूसरी तरफ, गलियारे में खड़ा आर्यन खुद को धिक्कार रहा था। उसने दीवार पर हल्का सा मुक्का मारा।
'घटिया इंसान! तू अपनी बहन के लिए ऐसा कैसे सोच सकता है? वो तेरी छोटी बहन है आर्यन, तेरी जान है! तूने उसे किस नज़र से देखा?'
उसका ज़मीर उसे कचोट रहा था। वह किचन में गया और फ्रिज से ठंडे पानी की बोतल निकालकर एक ही सांस में खाली कर दी। उसका चेहरा गुस्से और शर्म से लाल था। उसने खुद को समझाया कि यह सिर्फ एक मानवीय प्रतिक्रिया (Human reaction) थी, कुछ और नहीं। लेकिन वह जानता था कि उस एक पल के लिए उसके दिमाग में जो ख्याल आया था, वह 'भाई' वाला तो बिल्कुल नहीं था।
करीब एक घंटे बाद, दोनों डिनर टेबल पर आमने-सामने थे। आर्यन ने अब एक साधारण टी-शर्ट पहन ली थी। वह अपनी नज़रें आराध्या से चुरा रहा था। उसने प्लेट में खाना तो परोसा, लेकिन उसका ध्यान बार-बार भटक रहा था।
"खाना अच्छा बना है," आराध्या ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा। वह अब बहुत सामान्य दिख रही थी, जैसे ऊपर कुछ हुआ ही न हो।
"हाँ... हम्म," आर्यन ने छोटा सा जवाब दिया।
"भैया, आप ठीक तो हैं?" उसने जानबूझकर मासूमियत से पूछा।
आर्यन ने उसकी तरफ देखा, फिर अपनी नज़रें हटा लीं। "हाँ, बस थोड़ा सिरदर्द है। कॉलेज का काम ज़्यादा था। तुम खाना खत्म करो और सो जाओ। कल जल्दी निकलना है।"
आराध्या ने सिर हिलाया। वह समझ रही थी कि आर्यन असहज है। वह जानती थी कि उसने आर्यन के अंदर एक हलचल पैदा कर दी है। डिनर खत्म करने के बाद, आर्यन बिना किसी 'गुड नाईट किस' या 'दुलार' के सीधे अपने कमरे में चला गया और अंदर से कुंडी लगा ली।
आराध्या अपने कमरे में गई। उसने खिड़की के बाहर चाँद को देखा। आज की रात उसके लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आई थी। उसे यकीन होने लगा था कि यह एकतरफा मोहब्बत अब शायद दोतरफा होने की राह पर है।
वहीँ, आर्यन अपने बिस्तर पर लेटा छत को घूर रहा था। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य आ रहा था। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, जैसे उस छवि को मिटाना चाहता हो। लेकिन कुछ तस्वीरें ज़हन में इस तरह छप जाती हैं कि उन्हें मिटाना नामुमकिन हो जाता है।
उस रात, उस आलीशान बंगले में दो लोग सोए तो थे, लेकिन उनकी रूहें जाग रही थीं—एक प्यार की उम्मीद में, और दूसरा अपने ही चरित्र से जंग लड़ते हुए।
समाप्त (अध्याय 3)
Guys like and comments jarur kijiyega aur follow bhi kar lijiyega 🤗 अध्याय में हम इस तनाव को और बढ़ाएं?







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