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Chapter 1 3 ki dulhan

शहर के शोर-शराबे से दूर, एक शांत गांव की कच्ची सड़क पर एक महंगी चमचमाती कार आकर रुकती है। कार एक ऐसे घर के सामने रुकी जो बनावट में साधारण था—न बहुत बड़ा, न छोटा। कार का दरवाजा खुलता है और उसमें से तीन बेहद हैंडसम और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले लड़के बाहर निकलते हैं। ये कोई और नहीं, बल्कि रणविजय, करण और शिवांश थे।

वे तीनों भारी कदमों से घर के अंदर दाखिल होते हैं। कमरे के भीतर का माहौल शांत और गमगीन था। वहां बिस्तर पर 75 साल के एक बुजुर्ग लेटे हुए थे—रघुबीर शेखावत।

रघुबीर जी अपने जमाने के मशहूर बिजनेसमैन और एक खौफनाक माफिया रह चुके थे। लेकिन अचानक वे सब कुछ छोड़कर इस गुमनाम गांव में क्यों रहने लगे, यह राज आज भी किसी को नहीं पता था। तीनों पोतों ने पास जाकर अपने दादाजी के पैर छुए। अपने पोतों को देखकर रघुवीर जी की आंखों में चमक आ गई।

उन्होंने लड़खड़ाती आवाज में कहा, "तुम तीनों को यहाँ बुलाने की एक खास वजह है। मेरे पास अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है, लेकिन जाने से पहले मैं अपनी जिंदगी और अपनी जान तुम्हें सौंपना चाहता हूँ।"

तीनों भाई उलझन में पड़ गए। तभी रघुवीर जी ने मुख्य बात रखी, "मैं चाहता हूँ कि तुम तीनों मेरी बच्ची 'नूर' से शादी करो। वह बहुत भोली है, उसे इस जालिम दुनिया की समझ नहीं है।"

यह सुनते ही तीनों के पैरों तले जमीन खिसक गई। "शादी? और वह भी हम तीनों एक ही लड़की से? यह नामुमकिन है दादाजी!" रणविजय ने गुस्से में कहा। तीनों ने साफ मना कर दिया।

रघुवीर जी की आंखों में सख्ती आ गई। उन्होंने ठंडे स्वर में कहा, "अगर तुमने यह शादी नहीं की, तो मैं तुम्हें अपनी जायदाद से बेदखल कर दूँगा। याद रखना, यह सब तुम्हारे बाप की मेहनत का नहीं है, यह मेरी विरासत है। या तो शादी करो, या सड़क पर आ जाओ।"

सत्ता और संपत्ति खोने के डर से, तीनों भाइयों ने घूँट पीकर हां कर दी। उन्हें लगा कि शायद यह लड़की कोई लालची चालबाज है जिसने उनके दादा को फंसा लिया है। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि माफिया की गद्दी और इस जायदाद के पीछे असली ट्विस्ट कुछ और ही है।

अगले दिन गांव के पुराने मंदिर में माहौल तनावपूर्ण था। तीनों भाई शेरवानी पहने मंडप पर बैठे थे, उनके चेहरों पर नफरत साफ दिख रही थी। तभी लाल जोड़े और लंबे घूंघट में एक लड़की वहां आई—नूर।

रघुवीर जी व्हीलचेयर पर बैठे सब देख रहे थे। पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। रघुवीर जी ने मन ही मन सोचा, "मेरी बच्ची, मुझे पता है मैं तेरे साथ गलत कर रहा हूँ। ये तीनों शायद तुझे बहुत दुख दें, पर जब तक 'वो दोनों' नहीं आ जाते, तुझे यह सब सहना होगा। तेरी जान बचाने के लिए मुझे तुझे इस आग में झोंकना ही पड़ा।"

"विवाह संपन्न हुआ। आज से आप चारों पति-पत्नी हुए।" पंडित जी की आवाज गूंजी।

शादी के तुरंत बाद नूर दौड़कर दादाजी के गले लग गई और फफक-फफक कर रोने लगी। रघुवीर जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा, "रो मत बेटा, आज से ये तीनों ही तेरी जिंदगी हैं। बस वादा कर, तू इनका साथ कभी नहीं छोड़ेगी।"

नूर ने सिसकते हुए वादा किया। उधर, तीनों भाई बिना किसी भावना के यह सब देख रहे थे। उनके मन में बस एक ही ख्याल था—"रोएगी क्यों नहीं? फुटपाथ से महल में जो जा रही है। ऐसी लड़कियों को हम अच्छे से जानते हैं जो सिर्फ पैसों के लिए रिश्ता जोड़ती हैं।"

तभी अचानक रघुवीर जी की सांसें उखड़ने लगीं। उन्होंने चारों को आशीर्वाद दिया और हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। मंदिर में नूर की चीखें गूंज उठीं।

दादाजी का अंतिम संस्कार करने के बाद, तीनों भाई बिना कुछ कहे नूर को अपने साथ मुंबई की उस चकाचौंध भरी दुनिया में ले गए, जहाँ नफरत और साजिशें उसका इंतजार कर रही थीं।

एक आलीशान और काले रंग की एसयूवी (SUV) मुंबई की सबसे महंगी बस्ती में बनी एक विशाल हवेली के सामने रुकती है। यह घर किसी महल से कम नहीं था—ऊंची दीवारें, सुनहरी नक्काशी और चमकता हुआ संगमरमर। सफर के दौरान कार के भीतर सन्नाटा पसरा रहा; किसी ने नूर से एक शब्द भी नहीं कहा था। नूर अभी भी अपना लंबा घूंघट ओढ़े पिछली सीट पर सिमटी बैठी थी।

जैसे ही कार रुकी, तीनों भाई—रणविजय, करण और शिवांश—बिना पीछे मुड़े, नूर को वहीं छोड़कर तेजी से अंदर जाने लगे। नूर की आंखों में आंसू थे, पर उसने उन्हें पोंछा और लड़खड़ाते कदमों से उनके पीछे-पीछे चलने लगी।

तभी हॉल में एक कड़क आवाज गूंजी, "रणविजय! रुक जाओ।"

सामने आरती शेखावत खड़ी थीं, जिनके चेहरे पर कठोरता थी। उन्होंने घृणा भरी नजरों से नूर को देखा और पूछा, "यह लड़की कौन है? और इस तरह दुल्हन के लिबास में हमारे घर क्या कर रही है?"

रणविजय ने ठंडे स्वर में दादाजी के फैसले और मंदिर में हुई शादी की पूरी कहानी सुना दी।

आरती का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह अपने पति रौनक शेखावत की ओर मुड़ीं और चिल्लाते हुए बोलीं, "रौनक! देखिए पिताजी ने क्या किया! एक साथ तीन लड़कों की शादी एक ही लड़की से? वह भी इस अनपढ़ और गवांर दिखने वाली लड़की से? मैं इसे कभी अपनी बहू नहीं मानूंगी!"

रौनक शेखावत की आंखों में भी गुस्सा था। उन्होंने कहा, "पिताजी ने उम्र के उस पड़ाव पर आकर हम सबका अपमान किया है। यह शादी एक मजाक के सिवा कुछ नहीं है।"

तभी एक शांत और मधुर आवाज आई, "दीदी, ऐसा मत कहिए। पिताजी ने अगर यह फैसला लिया है, तो इसके पीछे जरूर कोई बड़ी वजह रही होगी।"

ये पूजा जी थीं (रणविजय की चाची और करण-शिवांश की मां)।

आरती जी ने उन पर पलटवार किया, "पूजा! मैं इस गवांर को अपने इकलौते बेटे रणविजय की पत्नी कभी नहीं मान सकती। मेरे बहुत अरमान हैं अपने बेटे की बहू के लिए। अगर तुम्हें इतना ही शौक है, तो अपने इन दोनों बेटों (करण और शिवांश) की पत्नी मान लो। पर जरा इनसे भी तो पूछो, क्या ये इसे अपनी पत्नी मानेंगे?"

करण और शिवांश ने एक साथ नूर की ओर देखा। उनके चेहरे पर घृणा और तिरस्कार था।

"कभी नहीं मां!" करण ने कहा। "इस जैसी मिडिल क्लास और लालची लड़की हमारे लायक तो क्या, हमारे नौकरों के लायक भी नहीं है।"

शिवांश ने भी गुस्से में नूर को काफी बुरा-भला कहा। पूजा जी अपने बेटों का यह व्यवहार देखकर चुप रह गईं, उनकी आंखों में नूर के लिए दया थी।

तीनों भाई बिना नूर की तरफ देखे अपने-अपने कमरों में चले गए। हॉल में सन्नाटा छा गया। आरती जी भी पैर पटकती हुई वहां से चली गईं।

पूजा जी धीरे से नूर के पास आईं। उन्होंने उसका हाथ पकड़ा और उसे एक कमरे में ले गईं। कमरे का दरवाजा बंद कर उन्होंने प्यार से कहा, "बेटा, हिम्मत मत हारना। हालात अभी खराब हैं, पर सब ठीक हो जाएगा।"

तभी पूजा जी ने धीरे से नूर का घूंघट उठाया। जैसे ही नूर का चेहरा सामने आया, पूजा जी की सांसें थम गईं। नूर की खूबसूरती ऐसी थी कि कोई भी उसमें खो जाए—बड़ी-बड़ी हिरनी जैसी आंखें, तराशा हुआ चेहरा और मासूमियत की चमक।

"तुम... तुम तो साक्षात परी हो, नूर!" पूजा जी ने उसकी तारीफ करते हुए कहा। उन्होंने उसे आराम करने को कहा और वहां से चली गईं।

अकेले कमरे में नूर बिल्कुल खामोश थी। उसके चेहरे के भाव पढ़ पाना नामुमकिन था। वह दुखी थी या डरी हुई, कुछ पता नहीं चल रहा था। वह बस खिड़की के बाहर शून्य में देख रही थी, जैसे किसी को याद कर रही हो। उसकी खामोशी में एक अजीब सा राज था। सोचते-सोचते न जाने कब उसकी आंखों में नींद उतर आई और वह वहीं सो गई।

क्या नूर इन तीनों भाइयों की नफरत सह पाएगी? और कौन हैं 'वो दोनों' जिनका रघुवीर जी को इंतजार था?

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