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Chapter 2 "दीदी, यह आप क्या कह रही हैं?

अगली सुबह, शेखावत हवेली में सूरज की पहली किरण के साथ ही कलेश की शुरुआत हो गई। आरती जी ने सुबह-सुबह नूर को हॉल में बुलाया और कठोर स्वर में कहा, "सुनो लड़की! आज से इस घर के सारे नौकरों की छुट्टी। घर की सफाई से लेकर रसोई तक का सारा काम तुम करोगी। हमारे घर में मुफ्त की रोटियां तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं है।"

यह सुनकर पूजा जी हैरान रह गईं। उन्होंने हिम्मत जुटाकर कहा, "दीदी, यह आप क्या कह रही हैं? बेचारी बच्ची अभी सिर्फ 18 साल की है, इतना बड़ा घर वह अकेले कैसे संभालेगी?"

"चुप रहो पूजा!" आरती जी ने उन्हें टोकते हुए कहा। "इसे अगर यहाँ रहना है, तो अपनी औकात साबित करनी होगी।"

नूर ने बिना कोई विरोध किए सिर झुका लिया और रसोई की ओर बढ़ गई। कुछ ही घंटों में उसने पूरे परिवार के लिए नाश्ता तैयार किया और उसे डाइनिंग टेबल पर सजाने लगी। तभी रणविजय, करण और शिवांश सीढ़ियों से उतरकर नीचे आए और अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठ गए।

तभी, पूरे हॉल में 'छन-छन' की मधुर आवाज गूंजी। तीनों भाइयों की नजरें अनायास ही उस दिशा में उठ गईं। नूर किचन से नाश्ते के कटोरे लिए बाहर आ रही थी। उसे देखते ही तीनों जैसे बुत बन गए।

नूर ने एक बेहद साधारण सा कॉटन का सूट पहना था, गीले बाल आधे बंधे थे और चेहरे पर रत्ती भर भी मेकअप नहीं था। लेकिन उसकी कुदरती खूबसूरती और सादगी ऐसी थी कि वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। रणविजय की सख्त नजरें पहली बार उसकी मासूमियत पर टिक गईं, करण की आंखों में हैरानी थी और शिवांश तो उसे देखता ही रह गया।

तभी आरती, रौनक और पूजा जी भी टेबल पर आ गए। पूजा जी ने प्यार से कहा, "नूर बेटा, तुम भी यहीं बैठ जाओ और हमारे साथ नाश्ता कर लो।"

आरती जी ने तुरंत मेज पर हाथ मारते हुए कहा, "खबरदार! यह लड़की हमारे परिवार का हिस्सा नहीं है। यह सिर्फ एक नौकरानी है और इसे इसकी औकात में ही रहना चाहिए। यह हमारे साथ नहीं, किचन के फर्श पर बैठकर खाएगी।"

नूर को इन बातों से चोट तो लगी, उसकी आंखों के कोरों में नमी आई पर उसने चुपचाप अपनी पलकें झुका लीं। पूजा जी ने अपने बेटों (करण और शिवांश) की तरफ उम्मीद से देखा कि शायद वे कुछ कहें, पर वे खामोश रहे। उन्हें भी अपनी मां का यह बर्ताव थोड़ा अजीब लग रहा था, पर नफरत अभी भी हावी थी।

नूर ने सबको खाना परोसा। जैसे ही रणविजय ने पहला निवाला लिया, वह रुक गया। खाने का स्वाद इतना लाजवाब था कि उसके जैसा स्वाद उन्होंने आज तक किसी फाइव-स्टार होटल में भी नहीं चखा था। करण और शिवांश भी चुपचाप खाने का लुत्फ उठाने लगे, हालाँकि वे यह जाहिर नहीं करना चाहते थे कि उन्हें खाना पसंद आया है।

पूजा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, खाना बहुत स्वादिष्ट है! पर इतनी कम उम्र में तुमने इतना हुनर कहाँ से सीखा?"

नूर के चेहरे पर एक हल्की और रहस्यमयी मुस्कान आई। उसने धीमी आवाज में कहा, "आंटी, बस किसी 'खास' के लिए सीखा था।"

आरती जी ने तुरंत तंज कसा, "जरूर अपने जैसे किसी सड़क छाप के लिए सीखा होगा।" नूर ने इस बार भी कोई जवाब नहीं दिया, बस अपना काम करती रही।

नाश्ता खत्म कर सभी अपने-अपने काम पर निकल गए, पर तीनों भाइयों के दिमाग में अभी भी नूर का वह सादगी भरा चेहरा और उसके हाथ का स्वाद घूम रहा था।

घर के सभी पुरुषों के जाने के बाद, आरती जी का असली रूप सामने आया। उन्होंने नूर की तरफ इशारा करते हुए कहा, "अब ये मेज साफ करो और पूरे घर का कोना-कोना चमकना चाहिए। एक धूल का कण भी दिखा तो खैर नहीं।"

पूजा जी ने पास आकर धीरे से कहा, "दीदी, सुबह से बच्ची ने कुछ नहीं खाया है, कम से कम इसे नाश्ता तो कर लेने दीजिए।"

आरती जी ने रसोई से एक स्टील की प्लेट में थोड़ा सा बचा हुआ खाना निकाला और उसे जमीन पर रखते हुए कहा, "खा ले! और याद रखना, तेरी जगह यही फर्श है।" पूजा जी से यह अपमान देखा नहीं गया और वह दुखी मन से अपने कमरे में चली गईं। नूर ने बिना कुछ कहे, खामोशी से जमीन पर बैठकर वही रूखा-सूखा खाना खाया और फिर घर की सफाई में जुट गई।

उधर शहर के सबसे ऊंचे बिजनेस टावर में, रणविजय अपने केबिन में काम में व्यस्त था। तभी दरवाजा खुला और उसकी गर्लफ्रेंड माया अंदर दाखिल हुई। माया ने एक बेहद बोल्ड और छोटी रेड ड्रेस पहनी हुई थी। वह अपनी ऊंची हील्स की आवाज करती हुई सीधे रणविजय के पास पहुंची।

"हाय बेबी! तुम कितना काम करते हो," माया ने नजाकत से कहा और रणविजय की गोद में बैठ गई। उसने रणविजय के गले में बाहें डाल दीं और उसके करीब आकर उसे किस करने लगी। रणविजय, जो घर में इतना सख्त रहता था, माया की मीठी बातों में उलझ गया।

माया ने उसके सीने पर उंगलियां घुमाते हुए कहा, "जानू, आज मेरा शॉपिंग का बहुत मन है। वो वाला डायमंड नेकलेस याद है? प्लीज..." रणविजय ने बिना कुछ सोचे अपना ब्लैक क्रेडिट कार्ड उसकी तरफ बढ़ा दिया। माया ने खुशी से उसे फिर किस किया और शॉपिंग के लिए निकल गई। रणविजय को अंदाजा भी नहीं था कि वह सिर्फ उसके पैसों से प्यार करती है।

शाम को तीनों भाई थके-हारे घर लौटे। नूर रसोई में सबके लिए रात का खाना तैयार कर रही थी। जब सब डिनर टेबल पर इकट्ठा हुए, तो माहौल फिर से भारी हो गया।

बातों-बातों में रौनक शेखावत ने शिवांश की ओर देखा और तंज कसा, "शिवांश, सुना है तुम फिर किसी ऑडिशन के चक्कर में थे? यह नौटंकी बंद करो और अपने भाइयों के साथ बिजनेस संभालो। एक्टर बनकर खानदान की नाक मत कटवाओ।"

रणविजय ने भी सख्त लहजे में कहा, "पिताजी सही कह रहे हैं। ये नाचने-गाने का काम हमारे खानदान के लड़कों को शोभा नहीं देता।"

शिवांश का पारा चढ़ गया। वह अपनी कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया, "आप सबको सिर्फ बिजनेस दिखता है, मेरे सपने नहीं! मुझे नहीं चाहिए आपकी दौलत।" वह चिल्लाकर बिना खाना खाए अपने कमरे की तरफ भाग गया। नूर, जो कोने में खड़ी थी, उसे शिवांश के लिए बहुत बुरा लगा। उसे उसकी आंखों में वही तड़प दिखी जो शायद वह खुद महसूस कर रही थी।

रात के करीब 11 बजे, जब पूरा घर सो गया था, नूर ने एक थाली सजाई और दबे पांव शिवांश के कमरे की ओर बढ़ी। उसने धीरे से दरवाजा खटखटाया।

शिवांश ने गुस्से में दरवाजा खोला और नूर को सामने देख उसकी आंखें और लाल हो गईं। "तुम यहाँ क्या कर रही हो? किसने कहा था यहाँ आने को?"

नूर ने कांपते हाथों से थाली आगे बढ़ाई और धीमी आवाज में कहा, "आपने खाना नहीं खाया था... भूखे पेट सोना अच्छा नहीं होता।"

शिवांश ने झटके से थाली की तरफ हाथ मारा, "अपनी ये हमदर्दी अपने पास रखो! तुम जैसी लड़कियां जो सिर्फ पैसों के लालच में यहाँ आई हैं, वो हमें नहीं सिखाएंगी कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। निकलो यहाँ से, दोबारा मेरे कमरे के आस-पास भी मत दिखना!"

शिवांश के कड़वे शब्दों से नूर की आंखों में आंसू आ गए। उसकी मासूमियत का ऐसा अपमान देखकर कोई भी टूट जाता। नूर ने अपनी सिसकी रोकी, थाली वहीं पास की मेज पर रखी और भारी आवाज में बस इतना कहा, "बस खाना खा लीजिएगा... अपना गुस्सा खाने पर मत निकालिए।"

वह वहां से मुड़ी और अपनी आंखों के आंसू पोंछते हुए अंधेरे गलियारे में गायब हो गई। पीछे कमरे में खड़ा शिवांश उसे जाते हुए देखता रहा, उसके मन में अजीब सी हलचल थी, पर नफरत अभी भी ज्यादा थी।

क्या शिवांश वह खाना खाएगा? और क्या नूर कभी इन तीनों भाइयों को यह यकीन दिला पाएगी कि वह लालची नहीं है?aur kon hai wo jiske liye noor ne khana banana sikha .

Guys apko meri ye new novel kesi lag rahi hai comment section me apni rate jarur de ☺️

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