हवेली की रसोई में आज बरसों बाद ज़िंदगी की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। मकड़ी के जालों और धूल की जगह अब पानी की बौछारें और ठहाकों ने ले ली थी। टाइगर, शेरा और छोटू, जो अब तक सिर्फ खून और बारूद की भाषा समझते थे, आज मीरा के निर्देशों पर किसी आज्ञाकारी सिपाही की तरह रसोई के बर्तन चमकाने में लगे थे।
रसोई साफ़ हो चुकी थी, लेकिन डिब्बे खाली थे। मीरा ने एक कागज़ पर ज़रूरी सामान की लिस्ट बनाई—ताज़ा आटा, घी, मसालों के पैकेट, बासमती चावल, सब्जियाँ और कुछ मीठा बनाने के लिए दूध और चीनी।














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