मकान की उस अंधेरी और बदबूदार कोठरी में मानवता दम तोड़ चुकी थी। पिंकी, जो कभी अपनी खूबसूरती पर गुमान करती थी, आज महज़ मांस का एक टुकड़ा बनकर रह गई थी जिसे चार भूखे भेड़िए नोच रहे थे। कमरे की हवा में शराब, पसीने और हवस की ऐसी सड़ांध थी कि किसी का भी जी मिचला जाए, लेकिन वहां मौजूद उन दरिंदों के लिए यह एक उत्सव था।
पिंकी अब पूरी तरह टूट चुकी थी। उसके शरीर पर जगह-जगह दाँतों के निशान और थप्पड़ों की सुर्खी उभर आई थी। राकेश, जो अब पूरी तरह आपा खो चुका था, उसने पिंकी को बेड के किनारे खड़ा किया और उसे झुकने का आदेश दिया।














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