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Chapter 1 "स्टॉप। यू आर लेट,

सुबह के दस बज रहे थे। यूनिवर्सिटी के गेट पर एक काले रंग की 'रोल्स रॉयस कुलिनान' आकर रुकी, जिसके पीछे काली स्कॉर्पियो गाड़ियों का पूरा काफिला था। जैसे ही कार का दरवाज़ा खुला, चार गनमैन बाहर निकले और एक घेरा बना लिया। कार से बाहर निकला— शौर्य प्रताप सिंह।

शौर्य, जिसके पिता न केवल राज्य के मुख्यमंत्री थे, बल्कि पूरे एशिया के नंबर वन बिजनेस टाइकून भी थे। शौर्य का कद लंबा, कसरती बदन और आँखों में वह गहरा अहंकार था जो सिर्फ बेहिसाब दौलत और ताकत से आता है। उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेरुखी थी, जैसे यह पूरी दुनिया उसके जूतों के नीचे हो। वह कॉलेज में अपनी डिग्री के लिए नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी चलाने आता था।

शौर्य अपनी धीमी मगर दबंग चाल से कॉरिडोर की ओर बढ़ा। छात्र अपना रास्ता छोड़कर किनारों पर खड़े हो गए। सन्नाटा ऐसा था कि उसकी महंगी लेदर की जूतियों की आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही थी।

उसी यूनिवर्सिटी के रूम नंबर 204 में, अद्रिका ब्लैक बोर्ड पर कुछ नोट्स लिख रही थी। अद्रिका, जो इस यूनिवर्सिटी की नई इकोनॉमिक्स प्रोफेसर थी। साधारण सी सूती साड़ी, चेहरे पर सौम्य मुस्कान, लेकिन आँखों में वह चमक जो सिर्फ़ शिक्षा और उसूलों से आती है। वह एक मिडिल क्लास परिवार से थी, जहाँ स्वाभिमान को रोटी से ऊपर रखा जाता था।

घड़ी की सुइयां 10:15 पर पहुँचीं। अद्रिका ने चौक नीचे रखा और दरवाज़े की ओर देखा। "जो छात्र अब तक नहीं आए हैं, उन्हें आज की क्लास में प्रवेश नहीं मिलेगा," उसने शांत मगर दृढ़ आवाज़ में कहा।

ठीक उसी पल, शौर्य प्रताप सिंह ने दरवाज़े पर लात मारी। दरवाज़ा धड़ाम से दीवार से टकराया। शौर्य के साथ उसके दो चमचे और पीछे खड़ा बॉडीगार्ड अंदर आने ही वाले थे कि अद्रिका की आवाज़ गूँजी।

"स्टॉप। यू आर लेट," अद्रिका ने बिना पलक झपकाए शौर्य की आँखों में देखते हुए कहा।

पूरी क्लास की सांसें अटक गईं। छात्रों ने एक-दूसरे को देखा, जैसे उन्हें यकीन न हो कि किसी ने शौर्य को टोकने की हिम्मत की है। शौर्य, जो अब तक अपने फोन में देख रहा था, उसने धीरे से सिर उठाया। उसकी भूरी आँखें अद्रिका के चेहरे पर टिकीं।

"क्या कहा तुमने?" शौर्य की आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें वह थरथराहट थी जो किसी तूफान के आने से पहले होती है।

"मैंने कहा, आप पंद्रह मिनट लेट हैं मिस्टर शौर्य। मेरी क्लास में नियम सबके लिए बराबर हैं। कृपया बाहर जाइये," अद्रिका ने शांति से जवाब दिया।

शौर्य ने एक कुटिल मुस्कान दी और बिना रुके अंदर बढ़ गया। वह अद्रिका के बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया। उसकी महँगी कोलोन की खुशबू अद्रिका के होश उड़ाने के लिए काफी थी, लेकिन अद्रिका टस से मस नहीं हुई।

"नियम?" शौर्य ने अपनी जेब से एक सोने का लाइटर निकाला और उसे जलाने लगा। "मैडम, शायद आप इस शहर में नई हैं। इस यूनिवर्सिटी की ज़मीन से लेकर इसके ट्रस्टीज़ की कुर्सियों तक, सब मेरे बाप के साइन से चलते हैं। और आप मुझे बाहर जाने को कह रही हैं?"

"आपके पिता मुख्यमंत्री हो सकते हैं, बिजनेस टाइकून हो सकते हैं, लेकिन इस क्लास के भीतर मैं आपकी प्रोफेसर हूँ और आप सिर्फ एक स्टूडेंट। और एक स्टूडेंट के पास बदतमीजी करने का कोई अधिकार नहीं होता," अद्रिका ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा। "और यहाँ स्मोकिंग मना है।"

शौर्य ने अपनी सिगरेट का धुँआ सीधे अद्रिका के चेहरे पर छोड़ा। पूरी क्लास में खौफ छा गया। अद्रिका को खाँसी आई, लेकिन उसने अपनी गरिमा नहीं खोई। उसने शौर्य के हाथ से सिगरेट छीनी और उसे पास रखे डस्टबिन में डाल दिया।

"बाहर जाइये। वरना मुझे डिसीप्लिनरी कमेटी को बुलाना पड़ेगा," अद्रिका ने कड़ी आवाज़ में कहा।

शौर्य की मुस्कान गायब हो गई। उसकी आँखों में अब वह अहंकार गुस्से में बदल चुका था। आज तक किसी ने उसे छूने की हिम्मत नहीं की थी, और इस साधारण सी दिखने वाली लड़की ने न सिर्फ उसे टोका, बल्कि उसका अपमान भी किया।

"कमेटी?" शौर्य फुसफुसाया। वह अद्रिका के चेहरे के इतना पास आया कि अद्रिका उसकी गर्म साँसें महसूस कर सकती थी। "मिस अद्रिका, कमेटी मेरे घर पर चाय पीने आती है। लेकिन आपने आज मेरा दिन दिलचस्प बना दिया।"

शौर्य ने क्लास के ब्लैकबोर्ड पर अपना हाथ मारा और अद्रिका के नाम के नीचे एक निशान बना दिया। "अब तक मुझे लगा था कि ये कॉलेज बोरिंग है। पर आपकी ये हिम्मत... ये मुझे पसंद आई। लेकिन याद रखिये, शौर्य प्रताप सिंह जो चाहता है, उसे हासिल करने के लिए नियम नहीं बदलता, वो दुनिया बदल देता है।"

शौर्य बिना क्लास अटेंड किए मुड़ा और बाहर निकल गया। उसके बॉडीगार्ड्स ने जाते-जाते क्लास के बेंच को ठोकर मारी। क्लास के खत्म होने तक अद्रिका के हाथ कांप रहे थे, लेकिन उसने अपनी क्लास पूरी की।

बाहर कॉरिडोर में, शौर्य अपनी कार की बोनट पर बैठा था। उसका दोस्त समीर उसके पास आया। "भाई, छोड़ न उसे। नई प्रोफेसर है, पागल है। तू कहे तो आज शाम तक उसकी नौकरी का लेटर रद्द करवा दूँ?"

शौर्य ने अपनी आँखों पर ब्लैक चश्मा चढ़ाया और कॉलेज की बिल्डिंग को देखा जहाँ से अद्रिका बाहर निकल रही थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और बस स्टैंड की ओर बढ़ने लगी।

"नहीं समीर," शौर्य ने धीमी आवाज़ में कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सा जुनून (Obsession) चमक रहा था। "नौकरी से निकालना तो बहुत आसान है। मैं चाहता हूँ कि ये लड़की मेरे सामने झुके। इसकी ये आज़ादी, इसके ये उसूल, ये स्वाभिमान... मैं इन्हें अपनी मुट्ठी में कुचलना चाहता हूँ।"

उसने अपनी कार स्टार्ट की और टायर घिसते हुए अद्रिका के पास से तेज़ रफ़्तार में गुज़रा। धूल का गुबार अद्रिका के चेहरे पर पड़ा, लेकिन शौर्य ने रियर-व्यू मिरर में उसे तब तक देखा जब तक वह ओझल नहीं हो गई।

शौर्य के दिमाग में अब इकोनॉमिक्स के ग्राफ नहीं, बल्कि अद्रिका का वह निडर चेहरा घूम रहा था। उसने तय कर लिया था—अद्रिका अब सिर्फ़ एक प्रोफेसर नहीं थी, वह शौर्य प्रताप सिंह का नया 'निशाना' थी। एक ऐसी जीत, जिसे वह अपनी शर्तों पर हासिल करना चाहता था।

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