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Chapter 4 मैं अपनी होने वाली बीवी से मिलने आया हूँ।"

रात भर की बेचैनी और अपनी बेबसी पर बहाए गए आँसुओं के बाद अद्रिका की आँखें सूज गई थीं। आईने में खुद को देखते हुए उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कल तक जो लड़की अपने उसूलों के लिए शेरनी की तरह दहाड़ती थी, आज वह अपनी ही छत के नीचे एक कैदी की तरह महसूस कर रही थी। मुख्यमंत्री का बेटा और एशिया का सबसे बड़ा बिजनेसमैन शौर्य प्रताप सिंह, उसके छोटे से घर की दहलीज लांघकर उसके वजूद पर कब्जा कर चुका था।

अगली सुबह जब अद्रिका यूनिवर्सिटी पहुँची, तो उसे हर चेहरा एक दुश्मन जैसा लग रहा था। उसे डर था कि कहीं कल शाम का तमाशा मोहल्ले से निकलकर कॉलेज की दीवारों तक न पहुँच गया हो। लेकिन कैंपस का माहौल हमेशा की तरह सामान्य था। छात्र अपनी मस्ती में थे, कैंटीन में शोर था और गलियारों में वही पुरानी चहल-पहल। ऐसा लग रहा था जैसे शौर्य ने उस खबर को अभी लोहे के संदूक में बंद कर रखा है।

अद्रिका ने अपना बैग कसकर पकड़ा और क्लास की ओर बढ़ी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे डर था कि शौर्य फिर से क्लास में कोई तमाशा करेगा। लेकिन जब उसने लेक्चर हॉल में कदम रखा, तो उसकी नज़रें अनचाहे ही उस पिछली बेंच की ओर गईं जहाँ शौर्य अक्सर अपने पैरों को मेज पर रखकर बैठता था।

वह सीट खाली थी। पूरी क्लास में शौर्य का कहीं नामो-निशान नहीं था।

पंद्रह मिनट गुज़रे, आधा घंटा गुज़रा, और फिर पूरा लेक्चर खत्म हो गया। शौर्य नहीं आया। अद्रिका को एक ठंडी राहत महसूस हुई। उसे लगा कि शायद कल की बात सिर्फ एक बुरा सपना थी या शायद शौर्य का मन बदल गया हो। एक गहरी सांस लेकर उसने अपनी किताबें समेटीं और अपने केबिन की ओर चल दी।

अपने केबिन में दाखिल होते ही अद्रिका ने दरवाज़ा बंद किया और अपनी कुर्सी पर ढह गई। "शुक्र है खुदा का... शायद उसे समझ आ गया कि ये सब पागलपन है," उसने खुद से फुसफुसाया और अपनी मेज पर रखे रजिस्टर्स को व्यवस्थित करने लगी।

तभी, अचानक उसे कमरे में एक तीखी और जानी-पहचानी महक महसूस हुई। महँगे तंबाकू और जलते हुए कागज की गंध। अद्रिका ने झटके से अपना सिर ऊपर उठाया।

केबिन के कोने में रखे सोफे पर नहीं, बल्कि सीधे उसकी अपनी मेज (Table) के किनारे पर शौर्य प्रताप सिंह बैठा था। उसके एक हाथ में जलती हुई सिगरेट थी और दूसरे हाथ से वह अद्रिका के पेन-स्टैंड के साथ खेल रहा था। वह उसे तब से देख रहा था जब से वह कमरे में आई थी।

"तुम... तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" अद्रिका हड़बड़ाहट में खड़ी हो गई। उसका सुकून पल भर में काफूर हो गया। "बाहर जाइये! यहाँ स्मोकिंग मना है और मैंने आपको अंदर आने की इजाजत नहीं दी।"

शौर्य ने सिगरेट का एक लंबा कश खींचा और धुआँ धीरे से छत की ओर छोड़ते हुए एक डरावनी मुस्कान दी। "इजाजत? मिसेज शौर्य प्रताप सिंह को शायद याद नहीं कि कल शाम हमारे बीच क्या तय हुआ था। मैं यहाँ किसी लेक्चर के लिए नहीं आया हूँ प्रोफेसर साहिबा... मैं अपनी होने वाली बीवी से मिलने आया हूँ।"

शौर्य ने अपनी सिगरेट मेज पर रखे अद्रिका के एक पेपर-वेट पर बुझा दी। उसकी आँखों में वही पुराना, गहरा अहंकार और वहशी जुनून था।

अद्रिका की आँखों में गुस्से के साथ-साथ लाचारी के आँसू आ गए। वह मेज के दूसरी तरफ गई और लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोली, "शौर्य, प्लीज... क्यों कर रहे हो तुम ये सब? क्या बिगाड़ा है मैंने तुम्हारा? सिर्फ एक थप्पड़ ही तो था... उसके लिए तुम मेरी पूरी ज़िंदगी बर्बाद कर दोगे? मुझे तुमसे शादी नहीं करनी। मैं एक साधारण लड़की हूँ, हमारा कोई मेल नहीं है। प्लीज, मुझे छोड़ दो... मुझे अपनी ज़िंदगी जीने दो।"

अद्रिका की आवाज़ टूट रही थी। उसके गालों पर आँसू ढुलक पड़े। वह एक ऐसी प्रोफेसर थी जो बड़े-बड़े सिद्धांतों की बात करती थी, लेकिन आज वह एक रईसज़ादे के सामने अपनी आज़ादी की भीख मांग रही थी।

शौर्य मेज से उतरा और अद्रिका के इतना करीब आया कि अद्रिका को पीछे हटने के लिए दीवार का सहारा लेना पड़ा। उसने अद्रिका के चेहरे को अपनी उंगलियों से ऊपर उठाया।

"शादी तो अब होकर रहेगी अद्रिका। और रही बात छोड़ने की... तो शौर्य प्रताप सिंह जिस चीज़ पर हाथ रख देता है, उसे कभी अधूरा नहीं छोड़ता," शौर्य ने ठंडी और सपाट आवाज़ में कहा। "और सुनो, अगर तुम्हारे दिमाग में शहर छोड़कर भागने का या पुलिस के पास जाने का छोटा सा भी ख्याल आ रहा हो, तो उसे अभी निकाल देना।"

शौर्य ने अपनी आवाज़ और धीमी कर ली, जो अब किसी ज़हरीले सांप की फुसफुसाहट जैसी लग रही थी। "तुम्हारे पिता की पेंशन, तुम्हारे भाई का करियर और तुम्हारी माँ की सलामती... ये सब अब मेरे एक मैसेज पर निर्भर करते हैं। अगर तुमने कोई भी चालाकी की, तो अपनी फैमिली को हमेशा के लिए भूल जाना। मैं उन्हें उस गर्त में फेंक दूँगा जहाँ से मौत भी उन्हें नहीं ढूंढ पाएगी।"

अद्रिका का शरीर कांपने लगा। वह फूट-फूट कर रोने लगी। "तुम इंसान नहीं हो... तुम एक राक्षस हो!"

"जो भी समझो," शौर्य ने अपना चश्मा वापस आँखों पर चढ़ाया। "फिलहाल के लिए ये शादी एक सीक्रेट रहेगी। मैं नहीं चाहता कि यूनिवर्सिटी में कोई तमाशा हो... अभी। जब तक मैं न चाहूँ, किसी को कानो-कान खबर नहीं होनी चाहिए कि तुम मेरी मंगेतर हो। अपनी गरिमा बनाए रखो प्रोफेसर साहिबा, क्योंकि तुम बहुत जल्द इस राज्य की सबसे ताकतवर औरत बनने वाली हो।"

शौर्य ने केबिन का दरवाज़ा खोला और बिना पीछे मुड़े बाहर निकल गया। पीछे छोड़ गया अद्रिका को, जो अपनी कुर्सी पकड़कर फर्श पर बैठ गई। केबिन में अभी भी सिगरेट के धुएँ की महक बाकी थी—एक ऐसी महक जो अद्रिका को हर पल याद दिलाती रहेगी कि उसका दम घुटने वाला है।

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