ट्रिन-ट्रिन... ट्रिन-ट्रिन...
ठीक दोपहर के तीन बजते ही प्राची के आईफोन का अलार्म बज उठा। उस तीखी आवाज़ ने कमरे के सन्नाटे को तोड़ा। प्राची ने आँखें मलीं, एक गहरी सांस ली और तकिए से सिर उठाकर बैठी। डेढ़ घंटे की उस गहरी और सुकून भरी नींद ने उसके बदन की बची-खुची थकान को पूरी तरह मिटा दिया था। हालांकि, उसके निचले हिस्से में अभी भी एक बहुत ही हल्का, सुलगता हुआ मीठा अहसास बाकी था, जो उसे रात के उस हिंसक और मुकम्मल मिलन की याद दिला रहा था।



















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