सुबह की सुनहरी धूप जब खिड़की के भारी पर्दों को चीरती हुई अद्रिका के चेहरे पर पड़ी, तो उसकी भारी पलकें झटके से खुलीं। कमरे में मोगरे की महक अब धुंधली पड़ चुकी थी, लेकिन फर्श पर बिखरे हुए फूल और बिस्तर की सिलवटें रात के उस भीषण तूफान की गवाही दे रहे थे। अद्रिका ने जैसे ही उठने की कोशिश की, उसके पूरे बदन में एक तीखी लहर दौड़ गई। कल रात की वहशी रस्मों और नींद की कमी ने उसके शरीर को पूरी तरह तोड़ दिया था।
दीवार पर लगी नक्काशीदार घड़ी की ओर देखते ही अद्रिका के होश उड़ गए। सुबह के 8:30 बज रहे थे। वह बुरी तरह लेट (Late) हो चुकी थी।
अद्रिका पागलों की तरह बिस्तर से उठी। उसने जल्दी से खुद को संभाला और तैयार होने के लिए बाथरूम की ओर भागी। आईने में अपनी गर्दन और कंधों पर शौर्य के दिए हुए नीले निशानों को देखकर उसे एक पल के लिए घृणा हुई, लेकिन आज उसके पास रोने का समय नहीं था। उसने जल्दी से एक हल्का मेकअप किया ताकि चेहरे की थकान छिप सके और एक ऊंचे गले का सूट पहना।
जैसे ही वह हड़बड़ाहट में सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आई, डाइनिंग टेबल पर ताज़ा ब्रेकफास्ट (Breakfast) सजा हुआ था। कमरे में सन्नाटा था, शौर्य कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।
"मैम, आप जाग गईं? सर तो एक घंटे पहले ही निकल चुके हैं," एक बूढ़े सर्वेंट ने झुककर विनम्रता से कहा।
"ठीक है, मुझे कॉलेज के लिए बहुत देर हो रही है, मैं जा रही हूँ," अद्रिका ने अपना बैग संभाला और दरवाज़े की ओर बढ़ने लगी।
"मैम! रुकिए!" सर्वेंट डरते हुए उसके सामने आ खड़ा हुआ। "प्लीज़, आप नाश्ता करके ही जाइए। सर ने सख्त हिदायत दी है कि आप बिना खाए घर से बाहर कदम नहीं रखेंगी। अगर आप बिना खाए गईं, तो सर मुझे आज ही नौकरी से निकाल देंगे।"
अद्रिका ठिठक गई। वह जानती थी कि शौर्य जो कहता है, वह कर देता है। वह किसी मासूम की नौकरी सिर्फ अपने अहंकार के लिए खतरे में नहीं डालना चाहती थी। उसने मजबूरी में जल्दी-जल्दी कुछ निवाले खाए और आधा गिलास जूस पीकर बाहर की ओर दौड़ी।
बाहर वही काली आलीशान गाड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी। ड्राइवर ने बिना कुछ कहे गेट खोला। अद्रिका चुपचाप पिछली सीट पर बैठ गई। उसका दिमाग तेज़ी से चल रहा था। आज वह खुद अपनी क्लास में 20 मिनट लेट थी। उसे रह-रहकर कल सुबह का वह दृश्य याद आ रहा था जब उसने शौर्य को सबके सामने अनुशासन का पाठ पढ़ाया था।
"क्या आज भी वह क्लास में होगा?" अद्रिका ने मन ही मन खुद से पूछा। उसे अहसास होने लगा था कि शौर्य का कल रात का वह 'अतिरिक्त' जुनून और उसे रात भर जगाए रखना सिर्फ लस्ट (Lust) नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी ताकि वह आज सुबह लेट हो जाए।
जैसे ही गाड़ी कॉलेज के गेट पर रुकी, अद्रिका लगभग दौड़ते हुए क्लासरूम की ओर बढ़ी।
अद्रिका हाँफते हुए क्लास के दरवाज़े पर पहुँची। उसने जैसे ही अंदर कदम रखा, पूरी क्लास की नज़रें उस पर टिक गईं। लेकिन सबसे तीखी नज़र शौर्य की थी, जो पिछली बेंच पर नहीं, बल्कि आज बिल्कुल सामने वाली बेंच पर हाथ पर हाथ धरे बैठा था। उसके चेहरे पर एक कुटिल और विजयी मुस्कान थी।
अद्रिका ने रजिस्टर मेज़ पर रखा और अपनी सांसें सामान्य करने की कोशिश की। "आई एम सॉरी क्लास, आज ट्रैफिक की वजह से मैं 20 मिनट लेट हो गई। चलिए, अटेंडेंस शुरू करते हैं..."
"रुकिए, प्रोफेसर साहिबा," शौर्य की गहरी और व्यंग्यात्मक आवाज़ ने उसे बीच में ही काट दिया।
पूरा कमरा सन्न रह गया। शौर्य अपनी जगह से खड़ा हुआ और बड़े सलीके से अपनी घड़ी की ओर देखा। "कल इसी क्लास में किसी ने अनुशासन और समय की पाबंदी पर बहुत लंबा भाषण दिया था। क्या कहा था आपने? 'पढ़ाई अनुशासन मांगती है'? आज वह अनुशासन कहाँ गया मैम? क्या 20 मिनट की देरी एक प्रोफेसर को शोभा देती है?"
अद्रिका का चेहरा अपमान से लाल हो गया। वह समझ गई कि शौर्य ने कल की अपनी बेइज्जती का हिसाब चुकता करने के लिए ही यह सारा जाल बुना था। उसे रात भर जगाना, उसे थकाना, और फिर सुबह उसे जानबूझकर लेट करना—यह सब इसी एक पल के लिए था।
शौर्य ने अपनी बात जारी रखी, "अगर एक छात्र लेट आए तो वह लापरवाह है, लेकिन अगर प्रोफेसर लेट आए तो वह 'ट्रैफिक' है? क्या ये दोहरे मापदंड (Double Standards) नहीं हैं? आपको क्या लगता है? कि सिर्फ पद होने से आप कानून से ऊपर हो जाती हैं?"
क्लास के छात्र आपस में कानाफूसी करने लगे। अद्रिका को महसूस हुआ कि शौर्य उसे मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ना चाहता था।
अद्रिका ने एक गहरी सांस ली। वह टूट सकती थी, लेकिन वह शौर्य को सबके सामने अपनी हार नहीं दिखाना चाहती थी। उसने अपनी आँखों से डर को हटाया और पूरी तरह प्रोफेशनल (Professional) बन गई।
"मिस्टर शौर्य प्रताप सिंह, आपकी बात तकनीकी रूप से सही है। समय की पाबंदी सबके लिए ज़रूरी है, और मेरी देरी के लिए मैंने माफी मांगी है। लेकिन एक प्रोफेसर और छात्र के बीच एक अंतर होता है—जिम्मेदारियां। मेरी देरी का कारण चाहे जो भी हो, मैं उसे अतिरिक्त समय देकर कवर करूँगी। अब, क्या हम अपना समय इस बहस में बर्बाद करने के बजाय पढ़ाई शुरू कर सकते हैं?"
अद्रिका ने सीधे शौर्य की आँखों में देखा और बिना पलक झपकाए कहा, "मिस्टर शौर्य, अपनी सीट पर बैठिए। हम यहाँ शिक्षा के लिए हैं, व्यक्तिगत टिप्पणियों के लिए नहीं। अगर आपको समय की इतनी ही चिंता है, तो पेज नंबर 142 खोलिए और ध्यान केंद्रित कीजिए।"
शौर्य कुछ पलों तक उसे देखता रहा। उसकी आँखों में अद्रिका के लिए एक अजीब सी प्रशंसा और नफरत का मिश्रण था। उसने हल्का सा सिर झुकाया और बैठ गया।
अद्रिका ने बोर्ड पर लिखना शुरू किया, लेकिन उसके हाथ अभी भी कांप रहे थे। उसे पता था कि भले ही उसने क्लास में खुद को बचा लिया हो, लेकिन शाम को जब वह वापस उसी विला में जाएगी, तो शौर्य इस 'जवाब' की वसूली और भी बेरहमी से करेगा। यह जंग अब सिर्फ बिस्तर तक सीमित नहीं थी, यह कॉलेज की मर्यादा और घर की बंदिशों के बीच एक खूनी खेल बन चुकी थी।
कॉलेज के गलियारे में क्लास खत्म होने की घंटी गूँजी, लेकिन अद्रिका के दिल की धड़कनें शांत नहीं थीं। सुबह शौर्य द्वारा सबके सामने किए गए तंज ने उसे मानसिक रूप से थका दिया था। उसने अपनी फाइलें समेटीं और जैसे ही जाने के लिए मुड़ी, क्लास का दरवाज़ा फिर से खुला।
अद्रिका की अगली क्लास शुरू होने वाली थी कि तभी प्रोफेसर विकास अंदर दाखिल हुए। विकास, जो कि डिपार्टमेंट में अद्रिका के काफी पुराने साथी थे और स्वभाव से काफी खुशमिजाज थे।
"अरे अद्रिका! रुको, एक ज़रूरी अनाउंसमेंट (Announcement) है," विकास ने मुस्कुराते हुए कहा। उन्होंने क्लास में छात्रों को आने वाले कल्चरल फेस्ट के बारे में जानकारी दी।
जब छात्र बाहर निकलने लगे, तो विकास अद्रिका के पास ही रुक गए। वे दोनों किसी पुरानी घटना को याद करके हँस-हँसकर बातें करने लगे। विकास बातों-बातों में अद्रिका के काफी करीब आ गए थे। देखने वाले को वे बेहद 'क्लोज' लग रहे थे।
वहीं पिछली सीट पर बैठा शौर्य, जिसने अभी तक क्लास नहीं छोड़ी थी, इस दृश्य को देख रहा था। उसकी आँखें लाल हो रही थीं और चेहरे की नसें तन गई थीं। अद्रिका, जो उसकी जागीर थी, जिसे वह रात भर अपने बिस्तर पर तड़पाता था, उसे कोई और छूने की हिम्मत कैसे कर सकता था?
तभी विकास ने हंसते हुए अपनी बात पर ज़ोर देने के लिए अपना हाथ अद्रिका के कंधे (Shoulder) पर रख दिया और उसे हल्के से थपथपाया।
शौर्य की मुट्ठियाँ कस गईं। उसके नाखूनों ने उसकी अपनी हथेली में घाव कर दिए। अद्रिका को अचानक एक अजीब सी बेचैनी (Uneasiness) महसूस हुई। उसे विकास का स्पर्श गलत नहीं लगा, लेकिन उसे अपनी पीठ पर शौर्य की जलती हुई नज़रों का अहसास हो गया था। उसने धीरे से अपना कंधा छुड़ाया।
"ठीक है विकास सर, मुझे एक काम है, मैं अपने केबिन (Cabin) में जा रही हूँ," अद्रिका ने नर्वस होकर कहा और तेज़ी से वहाँ से निकल गई। विकास भी मुस्कुराते हुए अपने केबिन की ओर चल दिए।
प्रोफेसर विकास गुनगुनाते हुए सुनसान गलियारे से गुज़र रहे थे। जैसे ही वह एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक के पास एक मोड़ पर पहुँचे, अचानक एक मज़बूत हाथ ने उनके कॉलर को पीछे से जकड़ा और उन्हें घसीटते हुए एक खाली पड़ी पुरानी क्लासरूम के अंदर फेंक दिया।
विकास संभल पाते, इससे पहले ही दरवाज़ा अंदर से लॉक हो गया। सामने शौर्य खड़ा था। उसकी आँखों में वह जुनून नहीं था जो अद्रिका के लिए होता था, बल्कि एक साइकिक (Psycho) हत्यारे जैसी ठंडक थी।
"श... शौर्य? ये क्या बदतमीजी है?" विकास ने घबराते हुए अपना चश्मा ठीक किया।
शौर्य धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ा। उसके चलने की आवाज़ उस सन्नाटे में मौत की आहट जैसी थी। "हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी?" शौर्य की आवाज़ इतनी धीमी थी कि विकास को कांपने पर मजबूर कर दिया। "उसे छूने की हिम्मत कैसे हुई?"
"किसे? अद्रिका को? वह मेरी कलीग है शौर्य, तुम..."
"मेरी है वो!" शौर्य ने दहाड़ते हुए विकास का गला पकड़ लिया और उन्हें दीवार से सटा दिया। "वो सिर्फ मेरी है। उसकी खाल के एक-एक इंच पर सिर्फ़ मेरा हक है। और तूने... तूने उसे इस हाथ से छुआ था न?"
शौर्य ने विकास का दाहिना हाथ पकड़ लिया। विकास दर्द से चिल्लाए, लेकिन शौर्य ने उनकी आवाज़ को दबा दिया।
"इसी हाथ से छुआ था..." शौर्य ने एक झटके में विकास का हाथ घुमाया। कमरे में हड्डी टूटने की 'कड़क' आवाज़ गूँजी। विकास की चीख उनके गले में ही घुट गई।
शौर्य यहीं नहीं रुका। उसके अंदर का जानवर पूरी तरह जाग चुका था। उसने विकास को नीचे गिराया और उनके सीने पर बैठकर उन्हें बेतहाशा मारना शुरू कर दिया। हर मुक्का अद्रिका के सम्मान के लिए नहीं, बल्कि शौर्य के उस मालिकाना हक (Possessiveness) के लिए था जिसे वह किसी के साथ साझा नहीं कर सकता था।
"आज के बाद अगर उसकी परछाईं के पास भी दिखे, तो ये हाथ नहीं, ये गर्दन अलग कर दूँगा," शौर्य ने विकास के खून से सने चेहरे के पास झुककर फुसफुसाया।
विकास अब दर्द और सदमे की वजह से बेहोश (Unconscious) हो चुके थे। उनका शरीर बेजान पड़ा था। शौर्य खड़ा हुआ, उसने अपने कोट की धूल झाड़ी और अपने खून से सने हाथों को रुमाल से साफ़ किया। उसने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा।
वह क्लासरूम से बाहर निकला, अपनी शर्ट की स्लीव्स नीचे कीं और चेहरे पर वही बेरुखी ओढ़कर अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गया। उसे अद्रिका के पास जाना था। उसे उसे यह बताना था कि उसकी आज़ादी का हर रास्ता शौर्य के खून और जुनून से होकर गुज़रता है। अद्रिका को अभी इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उसकी एक छोटी सी मुस्कान ने आज कॉलेज में एक खून की इबारत लिख दी थी।
अगले अध्याय में: कॉलेज में प्रोफेसर विकास के मिलने की खबर से हड़कंप। अद्रिका को शक होता है कि यह शौर्य का काम है। जब वह विला पहुँचकर शौर्य से जवाब मांगती है, तो शौर्य उसे किस 'वहशी' तरीके से शांत करता है?
Guys like and comments jarur kijiyega aur follow bhi kar lijiyega 🤗.
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