आसमान सुबह से ही घने, काले बादलों से घिरा हुआ था और दोपहर होते-होते झमाझम बारिश ने पूरे शहर को सराबोर कर दिया था। इस लखनवी अंदाज़ वाली पुरानी और आलीशान हवेली के बड़े से खुले आंगन में, चारों तरफ से गिरते पानी के बीच एक १८ साल की बेहद खूबसूरत, चुलबुली और मासूम सी लड़की ज़ोया अपनी दुनिया में मगन थी। उसने सफेद रंग का चिकनकारी का सलवार-सूट पहन रखा था, जो बारिश के पानी में भीगकर उसके बदन से पूरी तरह चिपक चुका था। वह अपनी दोनों बाहें फैलाकर गोल-गोल घूम रही थी और बारिश की बूंदों को अपने चेहरे पर समेट रही थी।
"ज़ोया! ऐ ज़ोया... अरी ओ लड़की, अंदर आ रही है या वहीं डंडा लेकर आऊँ?" आंगन के बड़े बरामदे में खड़ी उसकी अम्मी, रेशमा बेगम ने अपने हाथ में बेलन हिलाते हुए ज़ोर से चिल्लाया। "पूरा सूट भीग चुका है तेरा, शर्म-हया नाम की कोई चीज़ बची है या नहीं? और ऊपर से यह मौसम... बीमार पड़ जाएगी तो डॉक्टर के पास तुझे तेरा बाप लेकर नहीं जाएगा!"



















Write a comment ...