हवेली के उस एकांत कोने में मौजूद कमरा अब किसी अभिशप्त गुफा की तरह लग रहा था। बाहर चांदनी रात का पहरा था, लेकिन कमरे के भीतर नैतिकता की हर दीवार ढह चुकी थी। तान्या की आँखों में बदले की आग और हवस का एक ऐसा मेल था जो उसे किसी भी हद तक जाने के लिए उकसा रहा था। दुष्यंत, जो रिश्ते में प्रताप खानदान का बड़ा बेटा और शौर्य का ताऊ लगता था, अपनी उम्र और ओहदे की मर्यादा को पैरों तले कुचल चुका था।
तान्या ने दुष्यंत की आँखों में झाँका और एक झटके में उसके कुर्ते के बटन तोड़ते हुए उसे बदन से अलग कर दिया। दुष्यंत का ढलती उम्र का लेकिन भारी बदन अब बेपर्दा था। तान्या वहीं नहीं रुकी; उसने अपने पेटीकोट की गांठ खोली और अपना ब्लाउज उतारकर फर्श पर फेंक दिया। अब वह सिर्फ अपनी ब्लैक ब्रा और पैंटी में थी। दुष्यंत की आँखों में दरिंदगी उतर आई। उसने तान्या के सुडौल बदन को ऊपर से नीचे तक देखा और उसे अपने करीब खींच लिया।


















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