हवेली के उस बंद कमरे के भीतर की हवा अब दम घोंटने वाली हो चुकी थी। बाहर सुबह की ताज़ी धूप खिड़कियों के शीशों से टकरा रही थी, लेकिन पूजा के लिए वह रोशनी भी एक मातम की तरह थी। दुष्यंत के भीतर का जानवर अब पूरी तरह बेकाबू हो चुका था। वह अपनी पत्नी को एक इंसान नहीं, बल्कि अपनी हवस मिटाने वाली महज़ एक बेजान चीज़ समझ रहा था।
पूजा बिस्तर पर निढाल पड़ी थी, उसकी आँखों के आँसू अब सूखने लगे थे और उनकी जगह एक खौफनाक सन्नाटे ने ले ली थी। दुष्यंत नग्न अवस्था में उसके ऊपर खड़ा था। उसने अपने सख़्त वजूद (Dick) को पूजा के चेहरे और उसके घायल स्तनों (Boobs) पर सटाया और उन पर बार-बार थप्पड़ की तरह मारने लगा।


















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