हवेली के उस बंद कमरे के भीतर का मंज़र किसी नरक से कम नहीं था। बाहर चाँदनी रात की शीतलता छाई थी, लेकिन इस कमरे की दीवारों के पीछे पूजा की अस्मत और उसकी आत्मा को कुचला जा रहा था। दुष्यंत का नशा और उसकी वहशी दरिंदगी अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। संगीत की ऊँची आवाज़ के बीच पूजा के सिसकने का शोर दब चुका था।
पूजा उस शर्मनाक लिबास में, जो महज़ रस्सियों पर टिका था, दुष्यंत के सामने नाच रही थी। उसकी आँखों से गिरते आँसू उस काली पारदर्शी जाली को भिगो रहे थे। दुष्यंत सोफे पर नग्न अवस्था में पसरा हुआ था, उसकी आँखों में एक ऐसी क्रूर चमक थी जो किसी भूखे भेड़िये की होती है।


















Write a comment ...