हवेली के उस बंद कमरे में अगरबत्ती की भारी महक और पसीने की गंध आपस में घुली हुई थी। खिड़की के भारी पर्दों ने सूरज की रोशनी को दुश्मन की तरह बाहर ही रोक रखा था। कमरे के बीचों-बीच महोगनी की लकड़ी से बने उस विशाल बिस्तर पर 27 वर्षीय ज़ोया बेजान पड़ी थी। उसके हाथ-पाँव बिस्तर के चारों कोनों से मोटे रेशमी रस्सियों से बंधे हुए थे। उसका गोरा, सुडौल शरीर पूरी तरह निर्वस्त्र था, जिस पर जगह-जगह नीले निशान उसकी बेबसी की कहानी सुना रहे थे।
उसका शौहर, मंज़ूर, जो उम्र में उससे काफी बड़ा और कद्दावर था, इस वक्त किसी भूखे भेड़िए की तरह उसके पैरों के बीच झुका हुआ था। वह ज़ोया की कोमल जंघों को बेरहमी से झकझोरते हुए उसकी योनि (Pussy) को ज़ोर-ज़ोर से चूस रहा था। ज़ोया की आँखों में आँसू सूख चुके थे। वह छत की नक्काशी को देख रही थी, पर उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। वह बस एक ज़िंदा लाश की तरह वहाँ पड़ी थी।
मंज़ूर की जीभ और दाँतों का वह तीखा स्पर्श ज़ोया को उस अतीत में ले गया जहाँ से उसकी बर्बादी शुरू हुई थी। उसे याद आया अपनी नानी का वह छोटा सा घर, जहाँ उसकी माँ के इंतकाल के बाद उसके वालिद (पिता) ने उसे लावारिसों की तरह छोड़ दिया था। सालों तक उसके वालिद ने मुड़कर नहीं देखा कि उसकी बेटी किस हाल में है। लेकिन फिर अचानक एक दिन पैगाम आया।
वालिद ने उसे शहर बुलाया और कहा, "ज़ोया, मैंने तेरा निकाह अपने सगे भांजे मंज़ूर से तय कर दिया है।" ज़ोया ने विरोध नहीं किया। उसे लगा शायद इसी बहाने उसे अपने वालिद की मोहब्बत नसीब होगी। उसे क्या पता था कि उसका अपना बाप उसे प्यार नहीं, बल्कि हवस के एक बाज़ार में बेच रहा है। निकाह के बाद जब वह इस हवेली में आई, तो उसे पता चला कि वह मंज़ूर की पहली नहीं, बल्कि तीसरी बीवी है। मंज़ूर के लिए वह कोई जीवनसाथी नहीं, बल्कि एक 'भोग की वस्तु' थी।
"आह!" ज़ोया की एक चीख निकली जब मंज़ूर ने उसके नाजुक हिस्से को अपने दाँतों से ज़ोर से काट लिया। दर्द की एक लहर उसके पूरे शरीर में दौड़ गई।
मंज़ूर ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर एक दरिंदगी भरी मुस्कान थी। "क्या हुआ? दर्द हुआ? अभी तो मज़ा शुरू भी नहीं हुआ है ज़ोया," उसने अपनी भारी आवाज़ में कहा और उसके चेहरे पर थूक दिया।
"मंज़ूर... रहम करो... मैं तुम्हारी बीवी हूँ," ज़ोया ने कांपती आवाज़ में इल्तेजा की।
"बीवी?" मंज़ूर ठहाका मारकर हँसा। उसने बिस्तर के पास रखे अपनी लुंगी ढीली की और अपना विशाल और कठोर अंग (Dick) बाहर निकाला। "तू बीवी नहीं है, तू वो खिलौना है जिसे मैंने तेरे बाप से भारी कीमत देकर खरीदा है। साली, क्या कयामत लगती थी तू उस काले बुर्के में। तुझे पहली बार देखते ही तय कर लिया था कि तेरे इस बदन को मसलकर रख दूँगा।"
उसने ज़ोया के दोनों पैरों को और चौड़ा किया। बिना किसी नमी या कोमलता के, उसने अपने अंग को पूरी ताकत से ज़ोया के भीतर एक ही झटके में उतार दिया।
"नहीं!" ज़ोया का शरीर धनुष की तरह तन गया। उसे ऐसा लगा जैसे कोई जलती हुई सलाख उसके शरीर को चीरती हुई रूह तक पहुँच गई हो। मंज़ूर ने कोई रहम नहीं दिखाया। उसने अपनी कमर को पागलपन की हद तक चलाना शुरू कर दिया। बिस्तर की लकड़ी चरमरा रही थी और ज़ोया के बंधे हुए हाथ रस्सियों से रगड़ खाकर लहूलुहान हो रहे थे।
मंज़ूर के हर वार के साथ वह ज़ोया के कान में गंदी गालियां बक रहा था। "बोल... और ज़ोर से चिल्ला! तेरे वालिद ने पैसे लिए हैं इसके। अब तू इसी कमरे में रहेगी, इसी चादर में लिपटी हुई। बाहर की धूप तेरे इस जिस्म को नहीं छुएगी, सिर्फ मेरा ये अंग तुझे छुएगा।"
मंज़ूर की रफ्तार और तेज़ होती गई। वह ज़ोया के वक्षों (Breasts) को अपने हाथों से इतनी ज़ोर से भींच रहा था कि उसके नाखूनों के निशान उसकी त्वचा पर उभर आए थे। ज़ोया की सिसकियाँ अब शांत हो चुकी थीं। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे महसूस हो रहा था कि वह धीरे-धीरे इस दुनिया से दूर जा रही है।
तकरीबन आधे घंटे के उस वहशी खेल के बाद, मंज़ूर ने खुद को पूरी तरह ज़ोया के भीतर खाली कर दिया। वह बेदम होकर उसके ऊपर ही गिर पड़ा। उसकी भारी साँसें ज़ोया की गर्दन पर गर्म भाप की तरह लग रही थीं।
कुछ देर बाद वह उठा, अपनी लुंगी संभाली और बिना पीछे मुड़े कमरे से बाहर निकल गया, दरवाज़ा बाहर से बंद करने की आवाज़ गूँजी। ज़ोया अभी भी उसी अवस्था में बंधी हुई थी, निर्वस्त्र, अपमानित और टूटी हुई। उसने खिड़की की दरार से आती चाँदनी को देखा और बस एक ही दुआ माँगी—कि शायद अगली सुबह उसकी आँखें न खुलें।
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