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Chapter 3 Rebirth aur atit ka dar

ज़ोया की आँखें झटके से खुलीं। उसके सीने में उठने वाला वह तीखा दर्द, जो मंज़ूर की दरिंदगी की देन था, अब गायब था। उसने लंबी-लंबी साँसें लीं। उसे लगा जैसे वह अभी-अभी किसी गहरे समंदर से बाहर आई हो। उसने अपने चारों ओर देखा। यह वह कालकोठरी नहीं थी जहाँ उसे कैद किया गया था। यह तो उसके वालिद की हवेली का वह कमरा था जहाँ वह निकाह से पहले ठहरी थी।

"क्या मैं... ज़िंदा हूँ? क्या वह सब एक ख्वाब था?" उसने अपने कांपते हाथों से अपना चेहरा छुआ। उसकी त्वचा अभी कोमल थी, उन पर ज़ख्मों के निशान नहीं थे। तभी उसकी नज़र दीवार पर टंगे कैलेंडर पर गई। आज निकाह से एक दिन पहले की तारीख थी। ज़ोया का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसे एहसास हुआ कि खुदा ने उसे दूसरा मौका दिया है, वह वक्त में पीछे आ चुकी है।

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