हवेली के मुख्य मास्टर बेडरूम की फ़िज़ा में इस वक्त एक अजीब सा सन्नाटा और बिखरी हुई रोशनी छाई हुई थी। कमरे की विशाल खिड़की से बाहर ढलती हुई रात की ठंडी हवा अंदर आ रही थी। मेहर बेड के किनारे बैठी अपने बालों को संवार रही थी और अपने चेहरे पर छाई हल्की सी थकान को साफ करने की कोशिश कर रही थी। रसोई का सफ़ाया करवाकर उसने अपने पतियों और बेटों को अच्छी-खासी सज़ा तो दे दी थी, लेकिन उसका दिल अपने पतियों की उस हालत को देखने के लिए थोड़ा बेचैन भी था। वह जानती थी कि तीनों ने बर्तन धोए, पोंछा लगाया, फर्श साफ किया… लेकिन मन ही मन वह सोच रही थी कि कहीं वे बहुत ज़्यादा न थक गए हों।
तभी कमरे का भारी शीशम का दरवाज़ा धीरे से खुला। आरव, देव और रेयांश—तीनों एक-दूसरे के सहारे बेडरूम के भीतर दाखिल हुए।



















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