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Chapter 1 पाँचों पोतों की शादी देखना चाहता हूँ।

हॉस्पिटल के उस वीआईपी केबिन में सिर्फ वेंटिलेटर की बीप-बीप की आवाज़ गूँज रही थी। हवा में दवाइयों की तीखी गंध थी और माहौल में एक अजीब सा भारीपन। बेड पर एक कमज़ोर, बूढ़े आदमी लेटे हुए थे, जिनकी आँखें अंदर धँसी हुई थीं और सांसें उखड़ रही थीं। ये ओबेरॉय साम्राज्य के सबसे बड़े बुजुर्ग, बालकृष्ण ओबेरॉय (बाबूजी) थे।

उनके बेड के एक तरफ उनका बड़ा बेटा दिग्विजय ओबेरॉय खड़ा था, जिसके चेहरे पर गहरी चिंता थी। दिग्विजय ने बाबूजी का कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में लिया और बेहद भारी आवाज़ में बोला, "बाबूजी, आप बिल्कुल चिंता मत करिए। डॉक्टर ने कहा है कि आप जल्दी ठीक हो जाएंगे। आपको कुछ नहीं होगा।"

बालकृष्ण जी ने बहुत मुश्किल से अपनी सूखी हुई आँखें खोलीं। उनके चेहरे पर एक फीकी, बेबस मुस्कान आई। उन्होंने धीरे से अपना सिर हिलाया और हांफते हुए बोले, "दिग्विजय... अब तेरे इन दिलासों से कुछ नहीं होने वाला। मैं अपनी आखिरी घड़ियाँ गिन रहा हूँ। अब मेरे पास ज़्यादा समय नहीं बचा है। इसीलिए, आज मैं अपनी जिंदगी की आखिरी सांसें टूटने से पहले तुझसे कुछ मांगना चाहता हूँ।"

दिग्विजय की आँखों में आँसू आ गए। उसने तुरंत कहा, "जी बाबूजी, हुक्म करिए। मैं आपकी हर इच्छा पूरी करूँगा। आप बताइए, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?"

बालकृष्ण जी ने लंबी और गहरी सांस ली, मानो अपनी पूरी ताकत इकट्ठा कर रहे हों। उन्होंने अपने बेटे के हाथ को थोड़ा सा भींचा और बोले, "मैं इस दुनिया से जाने से पहले... अपने पाँचों पोतों की शादी देखना चाहता हूँ। क्या तू मेरी यह आखिरी इच्छा पूरी करेगा दिग्विजय? मुझे मरते हुए देखकर भी क्या तुम मुझे यह खुशी नहीं दोगे?"

यह सुनते ही दिग्विजय पूरी तरह से शॉक रह गया। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। पाँचों पोतों की शादी? अभी?

तभी बेड के दूसरी तरफ खड़ा बालकृष्ण जी का छोटा बेटा मनवेन्द्र ओबेरॉय भी हैरान रह गया। वह खुद को रोक नहीं पाया और आगे बढ़कर बोला, "मगर पिताजी... आप यह क्या कह रहे हैं? बच्चे अभी कितने छोटे हैं! सबसे बड़ा ज़रवान अभी 13 साल का है, उसके बाद अयांश 11 साल का, रेदांत 9 साल का, किशव 7 साल का और हमारा सबसे छोटा बेटा ओहान तो अभी सिर्फ 5 साल का है! इस उम्र में हम उनकी शादी कैसे करवा सकते हैं? कानूनन और समझदारी के हिसाब से भी यह बिल्कुल नामुमकिन है।"

बालकृष्ण जी के चेहरे पर थोड़ा सा गुस्सा और थोड़ी सी ज़िद आ गई। उन्होंने कमज़ोर आवाज़ में लेकिन कड़े लहज़े में कहा, "पुराने ज़माने में भी तो बचपन में शादियाँ हुआ करती थीं ना? क्या तब लोग अपनी जिंदगी नहीं जीते थे? मेरी आखिरी इच्छा के सामने तुम्हें यह कानून और उम्र दिख रही है? क्या तुम दोनों भाई मिलकर मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते?"

दिग्विजय ने देखा कि बाबूजी की पल्स रेट ऊपर-नीचे हो रही थी और डॉक्टर ने उन्हें किसी भी तरह के तनाव से दूर रखने को कहा था। उसने अपने छोटे भाई मनवेन्द्र को आँख से शांत रहने का इशारा किया और बाबूजी से बोला, "ठीक है बाबूजी... आप प्लीज परेशान मत होइए। हम आपकी यह इच्छा ज़रूर पूरी करेंगे। मैं आज ही, बल्कि अभी पंडित जी से बात करता हूँ और सब कुछ तय करता हूँ।"

यह सुनकर मनवेन्द्र पूरी तरह सन्न रह गया। वह अपने बड़े भाई दिग्विजय का मुँह देखता रह गया कि आखिर वह इतने बड़े पागलपन के लिए हाँ कैसे कर सकता है।

हॉस्पिटल से निकलने के बाद दोनों भाई सीधे अपनी आलीशान ओबेरॉय हवेली पहुँचे। दोनों के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। वे सीधे अंदर के एक पर्सनल मीटिंग रूम में गए और अपनी-अपनी पत्नियों को वहाँ बुलाया।

जैसे ही दिग्विजय की पत्नी वसुंधरा ओबेरॉय और मनवेन्द्र की पत्नी शारदा ओबेरॉय कमरे में आईं, दिग्विजय ने बिना कोई भूमिका बनाए सीधे कहा, "बाबूजी की हालत बहुत खराब है। और उन्होंने अपनी आखिरी इच्छा रखी है कि वो मरने से पहले अपने पाँचों पोतों—ज़रवान, अयांश, रेदांत, किशव और ओहान की शादी देखना चाहते हैं।"

"क्या?!" वसुंधरा के पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गई। "यह आप क्या कह रहे हैं? अभी तो हमारे बच्चे ठीक से बड़े भी नहीं हुए हैं! इतने छोटे बच्चों की शादी? लोग क्या कहेंगे? और यह कैसे मुमकिन है?"

शारदा भी हैरान थी, लेकिन उसने अपनी जेठानी वसुंधरा का हाथ पकड़ा। मनवेन्द्र ने अपनी पत्नी शारदा और भाभी वसुंधरा को समझाया, "भाभी, भैया सही कह रहे हैं। बाबूजी जिद पर अड़े हैं और डॉक्टर ने कहा है कि अगर उनका दिल दुखा या उन्हें स्ट्रेस हुआ, तो वो शायद आज की रात भी ना निकाल पाएं। हमें अपने ससुर जी की आखिरी इच्छा के लिए कुछ तो सोचना ही होगा।"

काफी रोने-धोने और बहस के बाद, दोनों माताएँ आखिरकार अपने ससुर की जान बचाने और उनकी आखिरी खुशी के लिए भारी मन से मान गईं।

शाम होते ही, शहर के सबसे बड़े और सिद्ध पंडित विद्याधर जी को गुप्त रूप से ओबेरॉय हवेली बुलाया गया। कमरे के सारे दरवाज़े बंद कर दिए गए ताकि बाहर किसी नौकर को भी भनक ना लगे।

दिग्विजय ने पंडित जी के सामने बैठकर कहा, "पंडित जी, हमें अर्जेंटली 5 ऐसी छोटी बच्चियों की तलाश है, जिनकी कुंडलियाँ हमारे पाँचों बेटों से पूरी तरह मेल खाती हों। हमें बाबूजी की इच्छा के लिए यह शादी बहुत जल्द करवानी होगी।"

पंडित विद्याधर जी ने अपना चश्मा ठीक किया और पाँचों लड़कों—ज़रवान, अयांश, रेदांत, किशव और ओहान की जन्म-कुंडलियाँ अपने सामने खोलकर रख दीं। उन्होंने अपनी उंगलियों पर कुछ गणित लगाया, ग्रहों की दशा देखी और अचानक उनके चेहरे का रंग सफेद पड़ गया। उनके हाथ कांपने लगे और उन्होंने गहरी चिंता में अपना सिर पकड़ लिया।

यह देखकर लड़कों की माँ वसुंधरा घबरा गई। उसने पूछा, "क्या हुआ पंडित जी? आप ऐसे शॉक क्यों हो गए? क्या बच्चों की कुंडली में कोई परेशानी है?"

पंडित जी ने बहुत गंभीर और डरी हुई आवाज़ में कहा, "बहुत बड़ी परेशानी है ओबेरॉय जी। आपके पाँचों बेटों की कुंडली में एक बहुत ही भयानक और घातक 'कालसर्प योग' है। यह कोई साधारण योग नहीं है। इस योग की वजह से आपके पाँचों बच्चों की जान को बहुत बड़ा खतरा है।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। पंडित जी ने आगे बताया, "अभी तो बच्चे छोटे हैं, इसलिए असर नहीं दिख रहा। लेकिन ठीक 5 साल बाद, यानी जब आपका सबसे बड़ा बेटा ज़रवान 18 साल का होगा और बाकी बच्चे भी धीरे-धीरे बड़े होंगे, तब इस योग का थोड़ा-थोड़ा असर दिखना शुरू होगा। उनके साथ हादसे होने लगेंगे। और जब वे अपनी जवानी की दहलीज़ पर होंगे, तब उनके ऊपर सबसे बड़ी बला आएगी... एक ऐसा जानलेवा संकट, जिसमें आपके पाँचों बच्चों की जान भी जा सकती है!"

"हे भगवान! यह मैं क्या सुन रही हूँ!" वसुंधरा जोर-जोर से रोने लगी। उसका कलेजा मुँह को आ गया। वह पंडित जी के पैरों में गिरने लगी, "पंडित जी, कोई तो उपाय होगा? आप तो सब जानते हैं, प्लीज मेरे बच्चों को बचा लीजिए! मैं अपने पाँचों बेटों को खोने का सोच भी नहीं सकती!"

उसकी छोटी देवरानी शारदा ने तुरंत उसे संभाला, उसे चुप कराया और खुद आँखों में आँसू भरकर पंडित जी से बोली, "पंडित जी, प्लीज शांत हो जाइए और हमें कोई रास्ता बताइए। क्या इस कालसर्प दोष का कोई तोड़ नहीं है? कोई पूजा, कोई हवन, कुछ तो होगा?"

पंडित विद्याधर जी ने अपनी पोथी बंद की और एक गहरी सांस लेकर बोले, "एक रास्ता है। इस पूरी दुनिया में सिर्फ एक ही ऐसी लड़की है, जिसकी कुंडली में एक विशेष 'अमृत योग' है। अगर उस लड़की की शादी आपके बेटों से हो जाए, तो उसके ग्रहों का प्रभाव इस कालसर्प योग को पूरी तरह खत्म कर देगा और बच्चों की रक्षा होगी।"

सबके चेहरों पर थोड़ी राहत आई ही थी कि पंडित जी ने अगला बम फोड़ा, "लेकिन... परेशानी यह है कि अगर उस लड़की की शादी नियमानुसार किसी एक बेटे से होती है, तो सिर्फ वही एक बेटा बच पाएगा। बाकी के चार बेटों पर से वह संकट नहीं टलेगा। वह लड़की सिर्फ एक ही लड़के की ढाल बन सकती है।"

"नहीं! ऐसा नहीं हो सकता!" वसुंधरा पागलों की तरह चिल्लाई। "मैं अपने किस बेटे को चुनूँ और किसे मरने के लिए छोड़ दूँ? मेरे लिए तो पाँचों एक बराबर हैं!"

पंडित जी ने चारों तरफ देखा, कमरे की दीवारों को जांचा कि कहीं कोई सुन तो नहीं रहा, फिर बिल्कुल धीमी और रहस्यमयी आवाज़ में बोले, "एक और रास्ता है... लेकिन क्या आप लोग समाज, दुनिया और कानून से ऊपर उठकर वो कदम उठा सकते हैं?"

"आप बताइए पंडित जी! हम अपने बच्चों के लिए कुछ भी करेंगे!" दिग्विजय, मनवेन्द्र, वसुंधरा और शारदा ने एक साथ कहा।

पंडित जी ने गहरी आवाज़ में कहा, "तो फिर... आप अपने उन पाँचों बेटों की शादी उसी एक अकेली लड़की से करवा दीजिए। जब वो एक लड़की पाँचों की पत्नी बनेगी, तो उसका वो अमृत योग पाँचों भाइयों के जीवन से उस कालसर्प दोष के जहर को हमेशा के लिए सोख लेगा।"

यह सुनते ही कमरे में मौजूद चारों लोग पूरी तरह से हिल गए। यह बात उनके होश उड़ाने के लिए काफी थी।

"यह आप क्या कह रहे हैं पंडित जी? यह कैसे मुमकिन है? एक लड़की और पाँच पति? यह तो सरासर अधर्म है, लोग हम पर थूकेंगे!" मनवेन्द्र ने गुस्से और हैरानी में कहा।

लेकिन बच्चों की माँ वसुंधरा, जो इस समय सिर्फ अपने बेटों की मौत के खौफ से कांप रही थी, उसने तुरंत अपने पति दिग्विजय का हाथ पकड़ा और रोते हुए बोली, "ठीक है पंडित जी! हम इस शादी के लिए तैयार हैं! मेरे पाँचों बेटे सलामत रहने चाहिए, मुझे दुनिया की कोई परवाह नहीं है!"

दिग्विजय गुस्से में चिल्लाया, "तुम पागल हो गई हो क्या वसुंधरा? तुम पूरी तरह स्वार्थी हो रही हो! अपने बेटों की जान बचाने के लिए तुम एक मासूम बच्ची की जिंदगी के साथ इतना बड़ा खेल खेलोगी? उसकी पूरी जिंदगी तबाह हो जाएगी!"

वसुंधरा ने रोते हुए दिग्विजय के पैर पकड़ लिए, "हाँ! मैं स्वार्थी हूँ! एक माँ अपने बच्चों के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकती है। मैं उस बच्ची को अपनी जान से भी बढ़कर चाहूँगी, उसे इस ओबेरॉय हवेली की मल्लिका बनाकर रखूँगी, उसे पलकों पर बिठाऊँगी... बस वो मेरे बेटों की रक्षा करे। प्लीज मना मत करिए!"

माहौल पूरी तरह से इमोशनल और तनावपूर्ण हो चुका था। आखिरकार, बच्चों के पिताओं को भी अपनी औलाद की जान के आगे झुकना पड़ा।

दिग्विजय ने आँसू पोंछते हुए पंडित जी से पूछा, "पंडित जी... आप बस उस लड़की का नाम और पता बताइए। वह कहाँ मिलेगी?"

पंडित जी ने धीरे से कहा, "वह बच्ची अभी सिर्फ 5 साल की है। उसका नाम सिया है। बहुत ही प्यारी और मासूम बच्ची है, लेकिन उसकी किस्मत बहुत खराब है। हाल ही में एक एक्सीडेंट में उसके माता-पिता का देहांत हो गया है। इस समय वह बिल्कुल अनाथ है।"

"तो वह रहती कहाँ है?" शारदा ने पूछा।

पंडित जी बोले, "वह शहर के पुराने शिव मंदिर के बाहर रोज़ सुबह फूलों की माला और बुके बेचती है। उसके माता-पिता के जाने के बाद, उसके चचा रमेश और चाची कमला उसे अपने पास रखे हुए हैं। लेकिन वे दोनों बेहद लालची, मतलबी और क्रूर लोग हैं। वे उस छोटी सी बच्ची से दिन-भर काम करवाते हैं और उसे ठीक से खाना भी नहीं देते। आप लोग समझदार हैं... आपको समझ आ गया होगा कि उन लालची लोगों को पैसे के दम पर कैसे मनाना है और उस बच्ची को यहाँ कैसे लाना है।"

दिग्विजय ने अपनी पत्नी वसुंधरा की तरफ देखा, जिसकी आँखों में अब अपने बच्चों को बचाने की एक अजीब सी चमक और ज़िद थी। दिग्विजय ने पंडित जी से कहा, "आप फिक्र मत करिए पंडित जी। आज रात ही सिया के चचा रमेश और चाची कमला से बात होगी। दौलत के दम पर ओबेरॉय साम्राज्य जो चाहे खरीद सकता है। कल सुबह होने से पहले, वह बच्ची हमारे घर में होगी और बाबूजी के सामने यह शादी तय होगी।"

[जारी रहेगा...]

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