अपने कमरे में बंद सिया दरवाज़े से पीठ सटाए फर्श पर ही बैठी रही। उसके दिमाग में बार-बार वही नज़ारा घूम रहा था जो उसने अभी कुछ देर पहले रेदांत के कमरे में देखा था। उसकी रगों में घिन की एक ठंडी लहर दौड़ रही थी।
"गंदा... घटिया... नाली का कीड़ा!" सिया ने गुस्से में अपने घुटनों पर मुक्का मारा। "छी! ऐसे लड़कों की तो शक्ल देखने में भी पाप लगता है। कैसे-कैसे लोग रहते हैं इस हवेली में! एक से बढ़कर एक नीच!"



















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