चाँदनी रात की उस मखमली खामोशी में बालकनी से कमरे के भीतर का सफर किसी ख्वाब जैसा था। ज़ोया की आँखों में आँसू अभी भी सूखे नहीं थे, लेकिन शाहनवाज़ की बाँहों की तपिश ने उसकी रूह की कड़वाहट को चाशनी में बदल दिया था। कमरे के भीतर मद्धम जलती मोमबत्तियों की रोशनी ज़ोया के गुलाबी गालों पर नाच रही थी। आज रात शाहनवाज़ का अंदाज़ वहशी नहीं, बल्कि एक इबादत जैसा था—जहाँ वह अपनी मलिका के हर दर्द और हर तड़प को अपना लेना चाहता था।
शाहनवाज़ ने ज़ोया को बहुत ही नज़ाकत से मखमली बिस्तर पर लेटा दिया। ज़ोया की साँसें अभी भी उखड़ी हुई थीं। शाहनवाज़ उसकी आँखों में झाँक रहा था, जहाँ प्यार, शिकायत और बेपनाह चाहत का एक समंदर हिलोरें मार रहा था।



















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