ओहान के कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही बाहर की दुनिया जैसे थम गई। कमरा विशाल था—गहरी नीली दीवारें, भारी मखमल के पर्दे, एक विशाल लकड़ी का चारपाई और कोने में पुरानी लकड़ी की अलमारी। खिड़की से चांदनी की हल्की किरणें अंदर घुस रही थीं, जो फर्श पर पड़े खून के हल्के निशानों को और साफ दिखा रही थीं। सिया ने ओहान को बिस्तर के किनारे बैठाया। उसकी साड़ी का फटा हुआ पल्लू अभी भी ओहान की हथेली पर कसकर बंधा था, लेकिन खून रिस-रिसकर बाहर आ रहा था।
सिया की साँसें तेज़ चल रही थीं। गुस्सा, सदमा और एक अजीब सी चिंता सब एक साथ उसके सीने में धड़क रहे थे। उसने कमरे के कोने में रखी फर्स्ट-एड बॉक्स खोली। रूई, एंटीसेप्टिक, बैंडेज—सब निकालकर टेबल पर रखे। ओहान चुपचाप बैठा उसे देख रहा था। उसकी आँखों में दर्द तो था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा एक गहरी, शांत खुशी तैर रही थी। सिया उसके घाव की देखभाल कर रही थी। उसकी उंगलियाँ सावधानी से काम कर रही थीं। वह खुद को नहीं, उसे संभाल रही थी।



















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