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chapter 1 पराई देह, अनचाहे बंधन

अस्पताल के उस वीआईपी कमरे में पसरा सन्नाटा इतना गहरा था कि मशीन की 'बीप-बीप' की आवाज़ भी किसी हथौड़े की तरह कान में चुभ रही थी। आर्या ने जब अपनी पलकें झपकाईं, तो उसे महसूस हुआ कि उसकी आँखों पर कोई भारी बोझ रखा है। धीरे-धीरे जब रोशनी धुंधली परतों को चीरकर उसकी आँखों में समाई, तो उसे सफेद छत और झिलमिलाता झूमर दिखाई दिया।

"मैं... मैं कहाँ हूँ?" उसके सूखे होंठों से एक कमजोर फुसफुसाहट निकली।

उसने अपने हाथ हिलाने की कोशिश की, लेकिन उसे भारीपन महसूस हुआ। जब उसने अपनी हथेलियों को देखा, तो वह ठिठक गई। वह हाथ उसका नहीं था। आर्या के हाथ सख्त थे, बरसों की मेहनत और ऑफिस की फाइलों को ढोने से उंगलियों के पोरों पर निशान पड़ चुके थे। लेकिन ये हाथ? ये तो मखमली थे। लंबी, पतली उंगलियां, मैनीक्योर किए हुए नाखून और कलाई पर चमकता हुआ एक कीमती हीरे का ब्रेसलेट।

तभी यादों का एक सैलाब उसके दिमाग से टकराया। वह काली रात, वह बेकाबू ट्रक, एक्टिवा का फिसलना और फिर वह आखिरी ठंडी सांस... वह मर चुकी थी। उसे यकीन था कि उस हादसे के बाद कोई नहीं बच सकता। तो फिर यह क्या था?

उसने पास रखे एक ऊंचे शीशे में अपना अक्स देखा और उसकी चीख गले में ही दब गई। शीशे में जो लड़की दिख रही थी, वह बला की खूबसूरत थी। दूध जैसा रंग, रेशमी बाल और तीखे नयन-नक्श। लेकिन यह 'आर्या' नहीं थी। यह कोई और थी।

अचानक उसके दिमाग में नसों के फटने जैसा दर्द हुआ। यादों की धुंधली तस्वीरें साफ होने लगीं। नाम— अनन्या मल्होत्रा। उम्र— 20 साल। रुतबा— शहर के सबसे रईस और रसूखदार परिवार की बहू। और सबसे चौंकाने वाली सच्चाई— उसकी शादी एक नहीं, बल्कि चार सगे मर्दों से हुई थी।

"नहीं... यह मुमकिन नहीं है," वह कांपते हुए बुदबुदाई। "एक ही घर के चार पुरुष और एक पत्नी? यह कैसा रिवाज है?"

तभी कमरे का भारी सागवान का दरवाजा खुला। चार साये अंदर दाखिल हुए। उनकी चाल में एक खास तरह का अहंकार और रुतबा था। आर्या, जो अब अनन्या के शरीर में थी, ने उन्हें गौर से देखा। वे चारों देखने में एक जैसे लंबे और प्रभावशाली थे, लेकिन उनकी आँखों में अनन्या के लिए जो नफरत थी, वह साफ झलक रही थी।

सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने, जिसका चेहरा पत्थर की तरह सख्त था, ठंडी आवाज में कहा, "तो आखिरकार, मल्होत्रा खानदान की बहू को होश आ ही गया। इस बार कौन सा नया तमाशा करने का इरादा है, अनन्या?"

उसकी आवाज में जहर था। आर्या ने अपनी यादों को कुरेदने की कोशिश की। यह अर्नव था, सबसे बड़ा। घर और बिजनेस की बागडोर इसी के हाथ में थी।

उसके पीछे खड़े दूसरे व्यक्ति ने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "शायद यह एक्सीडेंट भी एक नाटक ही था। धमकियां देना तुम्हारा पुराना पेशा है, लेकिन इस बार तुमने हद पार कर दी। खुद को नुकसान पहुँचाकर क्या साबित करना चाहती थी? कि हम तुम्हारे करीब आएंगे?"

यह विहान था। तेज दिमाग और कड़वी जुबान वाला।

तीसरे व्यक्ति ने, जो खिड़की के पास खड़ा होकर बाहर देख रहा था, मुड़कर भी नहीं देखा। उसकी चुप्पी सबसे ज्यादा डरावनी थी। वह कबीर था। शांत, गंभीर और अनन्या के अस्तित्व से पूरी तरह बेरुखी रखने वाला।

और सबसे छोटा, आर्यन, जो अनन्या के बिस्तर के पास आकर खड़ा हो गया। उसने नीचे झुककर अनन्या की आँखों में झांका। "तुम जानती हो अनन्या, माँ की तबीयत पहले से ही खराब है। तुम्हारे इस सुसाइड ड्रामा ने उन्हें और कमजोर कर दिया है। अगर तुम्हें इस घर में रहना है, तो तमीज सीख लो। वरना जिस दिन माँ की ममता का साया हटा, तुम्हें इस घर की दहलीज लांघने में हम एक पल की भी देरी नहीं करेंगे।"

आर्या (अनन्या) का दिल जोर से धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। पुरानी अनन्या ने इन चारों की जिंदगी नर्क बना रखी थी। वह जिद्दी थी, चालाक थी और अपनी खूबसूरती के दम पर इन्हें अपनी उंगलियों पर नचाना चाहती थी। लेकिन ये चारों उसे एक बोझ समझते थे। उनके बीच कोई प्यार नहीं था, बस एक अजीबोगरीब परंपरा का बंधन था जिसने उन्हें एक-दूसरे से बांध रखा था।

अर्नव ने आगे बढ़कर बेड की रील को कसकर पकड़ा। "सुनो अनन्या, हम चारों ने तुमसे शादी सिर्फ अपनी माँ की आखिरी ख्वाहिश और इस खानदान की परंपरा को बचाने के लिए की है। इसे 'शादी' समझने की भूल मत करना। हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं है और न कभी होगा। तुम इस घर की बहू बनकर रहो, ऐश करो, पैसे उड़ाओ... लेकिन हमारे निजी जीवन में दखल देने की कोशिश मत करना।"

विहान ने बात काटते हुए कहा, "और हाँ, वह जो तुम्हारा घटिया तरीका है, छोटे कपड़े पहनकर या शराब पीकर हमें रिझाने का... उसे बंद कर दो। उससे हमें नफरत के सिवा और कुछ महसूस नहीं होता।"

आर्या खामोश रही। उसने महसूस किया कि पुरानी अनन्या ने कितनी नफरत कमाई थी। एक अनाथ लड़की के तौर पर, आर्या ने हमेशा प्यार और परिवार के लिए तरसा था। और यहाँ? उसे एक परिवार मिला तो था, लेकिन वह नफरत की बुनियाद पर खड़ा था। चार पति, जिनके दिल में उसके लिए रत्ती भर भी जगह नहीं थी।

उसने गहरी सांस ली और उन चारों की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "ठीक है।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। अर्नव की भौहें तन गईं। विहान की मुस्कान गायब हो गई। यहाँ तक कि कबीर ने भी मुड़कर उसे हैरानी से देखा। पुरानी अनन्या कभी 'ठीक है' नहीं कहती थी। वह चिल्लाती थी, सामान फेंकती थी या फिर रोने का नाटक करती थी।

"क्या कहा तुमने?" आर्यन ने अविश्वास से पूछा।

अनन्या (आर्या) ने अपनी आवाज को स्थिर रखा। "मैंने कहा, ठीक है। अगर आप लोगों को मुझसे कोई उम्मीद नहीं है, तो मुझे भी आपसे कोई उम्मीद नहीं है। अब से मैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से जियूँगी। मैं न आपके बिजनेस में दखल दूंगी, न आपकी निजी जिंदगी में। बस मुझे शांति चाहिए।"

अर्नव ने उसे गौर से देखा, जैसे वह उसकी आँखों में किसी नए झूठ को तलाश रहा हो। "उम्मीद है कि यह तुम्हारा कोई नया गेम प्लान नहीं है। क्योंकि अगर तुमने फिर से कोई चाल चलने की कोशिश की, तो अंजाम बुरा होगा।"

"मुझे डराने की जरूरत नहीं है," अनन्या ने शांति से जवाब दिया। "मैं बस थक गई हूँ। मुझे आराम करने दीजिए।"

वे चारों एक-दूसरे को देख रहे थे। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। अनन्या का लहजा बदल चुका था। उसकी आँखों की वह लालच और चालाकी गायब थी, उसकी जगह एक अजीब सी गहराई और उदासी थी।

बिना कुछ और कहे, वे चारों कमरे से बाहर निकल गए। भारी दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

अनन्या ने अपना सिर पीछे टिका दिया और छत को देखने लगी। उसकी आँखों से एक आंसू लुढ़क कर तकिए में जज्ब हो गया। वह अब अनन्या थी। एक ऐसी औरत जिसकी शादी चार पुरुषों से हुई थी जो उससे नफरत करते थे। उसे इस महल जैसे घर में रहना था जहाँ हर दीवार उसे अजनबी लग रही थी।

"आर्या तो मर गई," उसने खुद से कहा। "अब मैं अनन्या हूँ। लेकिन मैं वह अनन्या नहीं बनूँगी जिससे ये लोग नफरत करते हैं। अगर मुझे इस नर्क जैसी शादी में रहना ही है, तो मैं इसे अपनी शर्तों पर जियूँगी।"

बाहर गलियारे में अर्नव रुका। उसके पीछे बाकी तीनों भी रुक गए।

"कुछ अजीब नहीं लगा?" विहान ने पूछा।

"वह बहुत शांत थी। जैसे वह अनन्या हो ही नहीं," आर्यन ने कहा।

अर्नव ने अपनी मुट्ठियां भींचीं। "यह उसका सबसे खतरनाक दांव हो सकता है। खामोशी अक्सर तूफान के आने का संकेत होती है। उस पर नजर रखो। वह क्या करती है, किससे मिलती है... मुझे हर जानकारी चाहिए।"

कबीर, जो अब तक खामोश था, धीमे से बोला, "शायद चोट गहरी लगी है। या शायद... वह सच कह रही हो।"

अर्नव ने कबीर को देखा और फिर बिना जवाब दिए आगे बढ़ गया। रात और गहरी हो चुकी थी। अस्पताल की खिड़की से बाहर चमकते सितारे गवाह थे कि एक रूह की मौत हो चुकी थी और दूसरी रूह एक ऐसे सफर पर निकल पड़ी थी, जहाँ हर कदम पर काँटे थे और हर रिश्ता एक पहेली।

अनन्या ने कमरे की लाइट बंद कर दी। अंधेरे में उसे अपना भविष्य भी वैसा ही धुंधला दिख रहा था, लेकिन उसके मन में एक दृढ़ संकल्प था। वह अब किसी के सामने नहीं झुकेगी। नफरत के इस घर में वह अपनी पहचान खुद बनाएगी।

Guys ye meri New novel hai . comment karke jarur batye me isse aage likhu ki nhi .

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