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chapter 57 क्या तुम अपनी माँ की इतनी सी बात नहीं मानोगे?"

मल्होत्रा मेंशन की हवाओं में अब भी कबीर और अनन्या के गुप्त मिलन की गर्माहट मौजूद थी, लेकिन वक़्त अपनी रफ़्तार से भाग रहा था। कमरे की दीवारों के पीछे जो जुनून पनपा था, उसे अब मर्यादा के आवरण में ढंकने का समय आ गया था।

कमरे के भीतर की उत्तेजना अब चरम पर थी। कबीर की सांसें अनन्या के जिस्म पर आग की तरह उतर रही थीं। जैसे ही कबीर ने अपनी रफ़्तार बढ़ानी चाही और अंतिम प्रहार के लिए आगे बढ़ा, अनन्या ने उसे मजबूती से रोक दिया।

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