देवराज के होंठ सुहानी के भीगे, काँपते होंठों पर टिके रहे। वह जल्दबाजी में नहीं था। नशे और बुखार की गर्मी के बावजूद उसकी हर हरकत में एक अजीब सी नरमी थी—जैसा कोई घायल जानवर अपनी चोट को सहला रहा हो। सुहानी की साँसें तेज़ हो रही थीं। उसके मन में पुरानी रात की यादें अभी भी तैर रही थीं—वह रात जब देवराज का शरीर केवल गुस्से और अधिकार से भरा था, जब दर्द ने उसकी रूह को चीर दिया था। आज भी वह डर कहीं भीतर बैठा था। लेकिन आज देवराज के स्पर्श में वह हिंसा नहीं थी। आज उसके होंठों में पछतावा और भूख दोनों घुले हुए थे।
सुहानी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसकी उंगलियाँ बेड की चादर को कसकर पकड़े हुए थीं। देवराज ने धीरे से उसका निचला होंठ चूसा, फिर ऊपर वाले को। उसकी जीभ ने सुहानी के होंठों के कोनों को चाटा। सुहानी के मुँह से एक बहुत हल्की, दबी हुई सिसकी निकली। देवराज ने उस आवाज़ को सुना और उसके सीने पर अपना माथा टिका दिया। उसकी साँसें सुहानी के गले पर गर्म-गर्म पड़ रही थीं।



















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