रोडसाइड मोमोज स्टॉल के तीखे-खट्टे अनुभव के बाद लक्ज़री एसयूवी फिर शहर की चौड़ी सड़कों पर दौड़ पड़ी। गाड़ी के अंदर माहौल हल्का हो चुका था। अनन्या की मासूम जिद और उस पाँच सौ के नोट वाली बात याद करके कबीर और आर्यन रह-रहकर जोर-जोर से हँस रहे थे, विहान और अर्णव सामने की सीटों पर मुस्कुरा रहे थे। हवेली का दमघोंटू सन्नाटा और चचेरे भाइयों की कड़वाहट अब काफी पीछे छूट चुकी थी।
गाड़ी शहर के सबसे आलीशान मॉल के बेसमेंट में रुकी। चारों हीरो अनन्या को लेकर मॉल के अंदर घुसे ताकि उसका मूड पूरी तरह ठीक हो जाए। वातानुकूलित हवा और महंगे सेंट ने उनका स्वागत किया। चारों भाइयों का रौब और पर्सनैलिटी ऐसी थी कि हर गुजरने वाला शख्स मुड़-मुड़कर उन्हें देख रहा था।




















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