सिया का पूरा शरीर काँप रहा था। रेदांत का खून उसके हाथों पर, कपड़ों पर, और गोद में फैला हुआ था। उसका सिर अभी भी सिया की गोद में था। साँसें चल रही थीं, लेकिन बहुत भारी और अनियमित। सिया बार-बार उसका नाम ले रही थी।
“रेदांत… रेदांत सुनो… आँखें खोलो… प्लीज…”
जवाब में सिर्फ खामोशी थी। सड़क सुनसान थी। दूर से गाड़ियों की आवाज़ आ रही थी, लेकिन कोई पास नहीं रुक रहा था। सिया ने रेदांत को संभालते हुए सड़क के किनारे कदम बढ़ाए। एक हाथ से वह रेदांत का सिर थामे हुए थी, दूसरे से आने-जाने वाली गाड़ियों को रुकने का इशारा कर रही थी।
पहली गाड़ी तेज रफ्तार से निकल गई। दूसरी ने हॉर्न बजाया और चली गई। तीसरी गाड़ी वाले ने खिड़की से गाली दी। सिया की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने हार नहीं मानी। वह सड़क के बीचों-बीच खड़ी हो गई। एक सफेद एसयूवी आ रही थी। सिया ने दोनों हाथ हवा में उठा दिए और जोर से चिल्लाई—
“रुकिए!! प्लीज रुकिए!!”
एसयूवी तेज ब्रेक लगाकर रुकी। अंदर से एक मध्य आयु का व्यक्ति उतरा। उसकी नजर जैसे ही खून से लथ-पथ रेदांत और सिया पर पड़ी, वह हैरान रह गया।
“क्या हुआ?! एक्सीडेंट?!”
सिया रोते-रोते बोली, “प्लीज… उसे हॉस्पिटल ले चलिए… बहुत खून बह रहा है… सर में चोट लगी है… प्लीज…”
आदमी ने तुरंत पीछे का दरवाज़ा खोला। सिया और उस आदमी ने मिलकर रेदांत को सीट पर लिटाया। सिया उसके सिर को अपनी गोद में लेकर बैठ गई। गाड़ी तेज गति से हॉस्पिटल की तरफ बढ़ी। सिया एक हाथ से रेदांत के माथे पर रूमाल दबाए हुए थी, दूसरे हाथ से उसका खून से सना हाथ पकड़े हुए थी। आँसू उसके गालों पर लगातार बह रहे थे।
“तुम पागल हो… रेदांत… लेकिन ऐसे मत… आँखें खोलो… मैं हूँ ना…”
बीस मिनट बाद गाड़ी हॉस्पिटल के इमरजेंसी गेट पर रुकी। सिया ने रेदांत को स्ट्रेचर पर लोड करवाया। डॉक्टर और नर्सें तुरंत आ गईं। सिया उनके साथ दौड़ती हुई अंदर गई। उसका पूरा शरीर खून से सना हुआ था—हाथ, चेहरा, कपड़े। लोग उसकी तरफ देख रहे थे, लेकिन उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
जैसे ही रेदांत को ओटी की तरफ ले जाया गया, सिया ने अपना फोन निकाला। हाथ काँप रहे थे। उसने ज़रवान का नंबर डायल किया। दो रिंग के बाद फोन उठा।
“सिया?” ज़रवान की आवाज़ में हैरानी थी।
सिया का गला भर आया। वह रोते हुए बोली, “ज़रवान… जल्दी आओ… हॉस्पिटल… रेदांत… एक्सीडेंट… बहुत खून… जल्दी आओ प्लीज…”
“कहाँ हो?! कौन सा हॉस्पिटल?!” ज़रवान की आवाज़ तुरंत गंभीर हो गई।
सिया ने हॉस्पिटल का नाम बताते हुए बार-बार दोहराया, “जल्दी आओ… मैं अकेली हूँ… वो बेहोश है…”
फोन कट गया। सिया दीवार से लगकर बैठ गई। दोनों हाथ उसके चेहरे पर थे। शरीर काँप रहा था। नर्सें आकर पूछ रही थीं, लेकिन सिया कुछ जवाब नहीं दे पा रही थी। सिर्फ एक ही बात उसके दिमाग में घूम रही थी—रेदांत का खून बहता चेहरा।
इमरजेंसी वार्ड के बाहर की घड़ी बता रही थी कि तीस मिनट बीत चुके थे। तभी तेज कदमों की आवाज़ आई। सिया ने सिर उठाया तो ज़रवान को देखा। उसके पीछे अयांश भी था। दोनों के चेहरों पर चिंता और गुस्सा साफ था।
सिया जैसे ही ज़रवान को देखी, वह वहीं की वहीं से टूट गई। वह दौड़कर ज़रवान के पास गई और उसकी छाती से चिपक गई। जोर-जोर से रोने लगी। शरीर इतना काँप रहा था कि खड़ा रहना मुश्किल हो रहा था।
“मैं… मैंने… वो… खून… बहुत खून था…” सिया की आवाज़ टूट-टूटकर निकल रही थी। “मैं डर गई… ज़रवान… वो बेहोश हो गया…”
ज़रवान ने तुरंत सिया को बाँहों में भर लिया। एक हाथ उसके सिर पर था, दूसरा कमर पर। वह सिया के बाल सहलाते हुए बार-बार कह रहा था, “शhh… मैं हूँ ना… शांत हो जाओ… मैं आ गया…”
अयांश भी पास आ गया। उसने सिया के कंधे पर हाथ रखा। आवाज़ में नमी थी। “सिया, देखो हमारी तरफ। रेदांत कैसा है? डॉक्टर ने क्या कहा?”
सिया अभी भी ज़रवान से चिपकी हुई रो रही थी। “मुझे नहीं पता… वो ले गए… ओटी में… बहुत खून था…”
ज़रवान ने सिया को थोड़ा दूर किया। दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़ा। आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ में दृढ़ता। “देखो मुझे। तुमने उसे यहाँ पहुँचाया। अब डॉक्टर देख रहे हैं। तुम मजबूत बनी रहो।”
इतने में ओटी का दरवाज़ा खुला और एक डॉक्टर बाहर आया। हाथों में खून के हल्के निशान थे। ज़रवान तुरंत उसके पास गया।
“डॉक्टर, मेरा भाई कैसा है? रेदांत ओबेरॉय।”
डॉक्टर ने मास्क नीचे किया। चेहरे पर थकान थी, लेकिन राहत भी। “वो ठीक हैं। मैडम उन्हें सही समय पर ले आईं। वरना कुछ भी हो सकता था। सर में चोट गहरी थी, खून भी काफी बह चुका था। लेकिन अब खतरा टल गया है। कुछ देर में उन्हें होश आ जाएगा। तब आप सबसे मिलवा देंगे।”
ज़रवान की मुट्ठी जो अब तक भींची हुई थी, धीरे से ढीली पड़ी। उसने गहरी साँस ली। अयांश ने भी राहत की साँस ली। सिया डॉक्टर की बात सुनकर वहीं की वहीं बैठ गई। आँसू अभी भी बह रहे थे, लेकिन अब उनमें घबराहट की जगह थोड़ी सुकून की भावना थी।
ज़रवान सिया के पास वापस आया। वह उसके पास बैठ गया और उसे फिर से बाँहों में ले लिया। सिया का सिर उसकी छाती पर था। अयांश दूसरी तरफ बैठकर सिया का खून से सना हाथ पकड़े हुए था।
“तुमने हिम्मत से काम लिया,” ज़रवान ने धीरे से कहा। “अकेली… इतने में… उसे बचा लिया।”
सिया ने सिर हिलाया। आवाज़ अभी भी रोई हुई थी। “मैं… मैं डर गई थी… सोचा अगर कुछ हो गया तो…”
अयांश ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरीं। “अब कुछ नहीं होगा। डॉक्टर ने कह दिया ना… वो ठीक हैं।”
तीनों वहीं इमरजेंसी वार्ड के बाहर बैठे रहे। सिया अब भी ज़रवान से चिपकी हुई थी। उसका शरीर धीरे-धीरे शांत हो रहा था, लेकिन हाथ अभी भी काँप रहे थे। ज़रवान एक हाथ से सिया को थामे हुए था, दूसरे हाथ से फोन पर बाकी लोगों को सूचना दे रहा था। अयांश चुपचाप सिया के खून लगे बालों को पीछे कर रहा था।
हॉस्पिटल की ठंडी रोशनी में तीनों बैठे थे। एक तरफ राहत थी कि रेदांत बच गया, दूसरी तरफ मन में कई सवाल घूम रहे थे—रेदांत सिया को कहाँ और क्यों ले जा रहा था? कार कैसे दुर्घटनाग्रस्त हुई? और सबसे बड़ी बात… सिया ने आखिरी पल में भी उसे अकेला नहीं छोड़ा।
सिया की आँखें बंद थीं। ज़रवान की छाती से चिपककर वह सिर्फ इतना महसूस कर रही थी कि अब वह अकेली नहीं है। अयांश का हाथ उसके हाथ में था। और थोड़ी देर में… रेदांत भी होश में आ जाएगा।
हॉस्पिटल के कॉरिडोर में समय धीरे-धीरे बीत रहा था। लेकिन तीनों के लिए हर मिनट भारी था। सिया कभी ज़रवान की छाती में चेहरा छुपा लेती, कभी अयांश की तरफ देखकर सिर हिला देती। दोनों भाई बारी-बारी से उसे थामे हुए थे—जैसे कोई अनमोल चीज़ हो जिसे फिर से खोने का डर हो।
और सिया… सिया पहली बार महसूस कर रही थी कि इन पाँचों में से कोई भी… उसके लिए सिर्फ नाम का पति नहीं था। खून के धब्बे अभी भी उसके कपड़ों पर थे, लेकिन अब उसका हाथ ज़रवान और अयांश के हाथों में सुरक्षित था।



















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