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chapter 1 kundali me dosh aur sadhi

बनारस के प्राचीन शिव मंदिर के प्रांगण में सुबह की पहली किरण अभी ठीक से पहुँची भी नहीं थी। ठंडी हवा के झोंकों के साथ गंगा की लहरों की आवाज़ और मंदिर के घंटों की गूँज मिलकर एक रहस्यमयी वातावरण बना रही थी। लेकिन वहां खड़े तीन संपन्न परिवारों के लिए यह सुबह शांति लेकर नहीं आई थी।

मल्होत्रा, ओबेरॉय और मेहता—ये तीनों परिवार शहर के रसूखदार नाम थे। लेकिन आज उनकी दौलत और शोहरत मंदिर की सीढ़ियों पर धरी की धरी रह गई थी। उनके चेहरों पर जो पीलापन था, वह किसी बड़े सदमे की आहट दे रहा था।

नैना मल्होत्रा ने अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ रखा था। उनके हाथ कांप रहे थे। उन्होंने धीमी आवाज़ में अपने पति राजवीर से कहा, "राजवीर, पुजारी जी ने जो कहा है, क्या वो वाकई सच हो सकता है? मेरा आरव... वो तो अभी सिर्फ २५ का है।"

राजवीर मल्होत्रा, जो बिज़नेस की दुनिया में पत्थर की तरह सख्त माने जाते थे, आज अपनी पत्नी को सांत्वना देने के लिए शब्द नहीं जुटा पा रहे थे। तभी मंदिर के गर्भगृह से पुजारी जी बाहर आए। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—जैसे वे वो सब देख पा रहे हों जो साधारण इंसान की नज़रों से ओझल था।

पुजारी जी ने एक जलता हुआ दीया पीतल की थाली में रखा और तीनों परिवारों को पास आने का संकेत दिया। उन्होंने गंभीर स्वर में कहना शुरू किया:

“कुंडली के सितारे झूठ नहीं बोलते। आपके तीनों बेटों की कुंडलियों में एक ऐसा दुर्लभ 'विषाक्त सर्प दोष' है, जो एक साथ जागृत हुआ है। कल सूर्योदय के साथ जो नक्षत्र बदल रहे हैं, वे उनके जीवन के लिए काल बनकर आ रहे हैं। अगर उपाय नहीं हुआ, तो कल की शाम वे नहीं देख पाएंगे।”.

विक्रांत ओबेरॉय का चेहरा गुस्से और डर से तमतमा उठा। "पुजारी जी, आज के युग में ये सब? हम आपको करोड़ों का दान देंगे, आप कोई महायज्ञ करवाइए!"

पुजारी जी ने शांत भाव से सिर हिलाया। "महारानी और महाराजाओं के समय से कुछ दोष ऐसे होते हैं जिनका समाधान दान-पुण्य नहीं, बल्कि 'बलिदान' और 'समर्पण' मांगता है। इन तीनों लड़कों के दोष को केवल एक ऐसी कन्या काट सकती है जिसकी अपनी कुंडली में 'अमृत योग' हो। लेकिन शर्त ये है कि उसे इन तीनों के जीवन का भार एक साथ उठाना होगा।"

राघव मेहता ने आगे बढ़कर पूछा, "आप कहना क्या चाहते हैं? खुलकर बताइए।".

पुजारी जी की आवाज़ मंदिर की दीवारों से टकराकर गूँजी, "एक कन्या... तीन पति। उसे इन तीनों की अर्धांगिनी बनना होगा। तभी वह अपने अमृत योग से इनके जीवन पर मंडरा रहे विष को सोख पाएगी।"

३. पुरानी हवेली की मेहर

शहर के दूसरे कोने में, जहाँ तंग गलियाँ और पुराने मकान इतिहास की गवाही देते थे, मेहर शर्मा अपनी छोटी सी रसोई में चाय छान रही थी। खिड़की से आती धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी सादगी और निखर रही थी।

मेहर के माता-पिता सालों पहले एक दुर्घटना में चल बसे थे। तब से वह अपने चाचा महेश और चाची रेखा के साथ रह रही थी। उसके लिए ज़िंदगी का मतलब था—सुबह उठकर घर का काम करना और चाची के कड़वे बोल सुनना।

"मेहर! चाय बनी या नहीं? हाथ चला रही है या सो गई?" रेखा चाची की तीखी आवाज़ ड्रॉइंग रूम से आई।

मेहर ने जल्दी से ट्रे सजाई और बाहर ले गई। रेखा चाची अखबार पढ़ रही थीं, लेकिन उनकी नज़रें किसी योजना में उलझी थीं। उन्होंने मेहर को देखते ही कहा, "आज ज़रा ढंग के कपड़े पहन लेना। कुछ बड़े लोग आने वाले हैं। हमारी रीमा के लिए रिश्ता आ सकता है, पर तू घर साफ रखना वरना वो क्या सोचेंगे।"

मेहर ने सिर्फ सिर झुका लिया। उसे क्या पता था कि आज उसके जीवन की आखिरी 'शांतिपूर्ण' सुबह थी।

हवेली के मुख्य द्वार पर मेहर प्रकट हुई। भारी घूँघट के पीछे से वह केवल ज़मीन देख पा रही थी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। जैसे ही वह मंडप में पहुँची, आरव ने अपनी नज़रों से उसे ऊपर से नीचे तक नापा। उसके मन में आया— 'तो यही है वो लड़की जिसने दो करोड़ में अपना ईमान बेच दिया।'

रुद्राक्ष ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। देव ने बस एक ठंडी आह भरी।

पंडित जी ने कहा, "कन्या का हाथ वरों के हाथ में दीजिए।"

मेहर के पिता समान चाचा ने कांपते हाथों से मेहर का दाहिना हाथ आगे बढ़ाया। आरव, रुद्राक्ष और देव ने एक साथ अपना हाथ नीचे रखा। जब मेहर की ठंडी और कांपती हथेलियों ने उन तीनों के स्पर्श को महसूस किया, तो उसे एक बिजली के झटके जैसा अहसास हुआ। आरव का हाथ सख्त और गर्म था, रुद्राक्ष की पकड़ में एक अजीब सा गुस्सा था, और देव का स्पर्श... वह न्यूट्रल था, जैसे वह वहां होकर भी वहां न हो।

अग्नि के सात फेरे शुरू हुए। मेहर आगे चल रही थी, और उसके पीछे तीन कतारबद्ध परछाइयाँ। हर फेरे के साथ पंडित जी मंत्र पढ़ रहे थे, लेकिन मेहर को लग रहा था कि उसकी आज़ादी की अर्थी उठ रही है।

आरव मन ही मन दोहरा रहा था— "यह सिर्फ एक रात की बात है।"

रुद्राक्ष सोच रहा था— "मैं इसकी ज़िंदगी नर्क बना दूँगा।"

देव सोच रहा था— "नियति कितनी क्रूर है।"

जब सिंदूर भरने की रस्म आई, तो पुजारी ने एक विशेष पात्र में सिंदूर दिया जिसे तीनों को एक साथ स्पर्श करना था। मेहर की मांग में जब वह लाल रंग सजा, तो उसे लगा जैसे उसके माथे पर गुलामी की मुहर लग गई हो।

"विवाह संपन्न हुआ," पंडित जी ने घोषणा की।

आस-पास के बड़े-बुजुर्गों ने तालियाँ बजाईं, माता-पिताओं के चेहरे पर सुकून आया कि उनके बेटों की जान बच गई। लेकिन उन चारों के लिए, यह मौत से बदतर शुरुआत थी।

शादी की रस्मों के तुरंत बाद, मेहमानों के जाते ही माहौल का तापमान गिर गया। मेहर अभी भी मंडप के पास बैठी थी, उसकी आँखों से लगातार आँसू गिर रहे थे।

आरव ने अपना साफ़ा उतार कर ज़मीन पर फेंका। "हो गया आपका नाटक? अब हम जा सकते हैं?"

राजवीर मल्होत्रा चिल्लाए, "आरव! यह तुम्हारी पत्नी है, उसे साथ लेकर अपने कमरे में जाओ।"

आरव मेहर की ओर मुड़ा। उसकी नज़रों में इतनी हिकारत थी कि मेहर सिहर उठी। "पत्नी? डैड, आपने कहा था शादी करो—हमने कर ली। आपकी कुंडली का दोष कट गया, हमारी मौत टल गई। बस, डील पूरी हुई। अब इस लड़की का चेहरा मैं दोबारा नहीं देखना चाहता।"

रुद्राक्ष ने मेहर के पास आकर उसके घूँघट को अपनी उंगली से थोड़ा ऊपर उठाया। मेहर ने डरकर आँखें बंद कर लीं। "सुंदर है... पर ज़हरीली। दो करोड़ की कीमत तो हमने चुका दी, अब अपनी ये मासूमियत कहीं और दिखाना।"

देव ने बस इतना कहा, "हवेली बड़ी है मेहर, अपना कोना ढूँढ लेना। यहाँ दिल किसी के पास नहीं है।"

तीनों अपनी-अपनी कारों की चाबियाँ लेकर हवेली से बाहर निकल गए। मेहर वहीं ज़मीन पर बैठ गई। उसके लाल जोड़े के सितारे बिजली की रोशनी में चमक रहे थे, पर उसकी रूह अंधेरे में डूब चुकी थी।

पंडित की बुझती हुई अग्नि से निकलता धुआँ पूरे हॉल में फैल गया, जैसे इस 'अपवित्र' पवित्र रिश्ते का शोक मना रहा हो। मेहर ने आसमान की ओर देखा और कांपती आवाज़ में कहा, "हे ईश्वर... अगर बचाने के लिए यही रिश्ता था, तो काश मैं मर ही जाती।"

शादी की रस्में किसी तरह पूरी हुईं, पर उत्सव जैसा कुछ भी नहीं था। मल्होत्रा हवेली, जो अपनी चमक-धमक के लिए जानी जाती थी, आज एक शांत कारागार की तरह लग रही थी। मेहर, जो अब इस घर की 'साझा बहू' बन चुकी थी, कांपते पैरों से हॉल के बीचों-बीच खड़ी थी। उसका लाल जोड़ा अब उसे किसी सम्मान की निशानी नहीं, बल्कि एक भारी बोझ लग रहा था।

नैना मल्होत्रा (आरव की माँ) ने आगे बढ़कर मेहर के ठंडे पड़ चुके हाथों को अपने हाथों में लिया। नैना के दिल में ममता तो थी, पर वह अपने पति के फैसलों के आगे मजबूर थी। उन्होंने मेहर को एक भव्य कमरे की ओर ले जाते हुए कहा:

"बेटी, मैं जानती हूँ तुम पर क्या बीत रही है। यह घर, यह माहौल, और यह अजीब सी स्थिति... किसी भी लड़की के लिए इसे स्वीकार करना आसान नहीं है। पर आज तुम बहुत थक गई हो। यह कमरा आज से तुम्हारा है। यहाँ तुम सुरक्षित हो।"

मेहर ने कुछ नहीं कहा। उसकी आवाज़ जैसे कहीं खो गई थी। कमरे के भीतर की सजावट—कीमती कालीन, झाड़-फानूस और मखमली बिस्तर—उसे चिढ़ा रहे थे। नैना ने उसके माथे को चूमा और भारी मन से बाहर निकल गईं। जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, मेहर वहीं ज़मीन पर बैठ गई। उसने अपने गहनों को उतारने की कोशिश की, पर उसके हाथ कांप रहे थे।

हवेली से कुछ किलोमीटर दूर, तीन अलग-अलग रास्तों पर तीन गाड़ियाँ तेज़ रफ़्तार में दौड़ रही थीं। आरव, रुद्राक्ष और देव—तीनों ही इस शादी के मंडप से भाग जाना चाहते थे। उन्हें लगा था कि फेरे लेने के बाद उनकी 'ज़िम्मेदारी' खत्म हो गई और अब वे अपनी पुरानी ज़िंदगी में लौट सकते हैं।

पर नियति (और उनके पिताओं) की योजना कुछ और ही थी।

अचानक, तीनों के फोन एक ही समय पर बज उठे। डैशबोर्ड पर 'Dad' का नाम चमकते ही आरव ने स्टेयरिंग पर ज़ोर से हाथ मारा। उसने कॉल उठाया:

राजवीर मल्होत्रा (सख्त लहजे में): "आरव, गाड़ी घुमाओ और तुरंत हवेली वापस आओ! यह कोई गुज़ारिश नहीं, हुक्म है।"

आरव (चिल्लाते हुए): "Dad! मैंने शादी कर ली, आपकी जान बच गई। अब और क्या चाहिए आपको? क्या आप चाहते हैं कि मैं उस लड़की के साथ घर-घर खेलूँ?"

राजवीर: "वह लड़की अब इस खानदान की इज़्ज़त है। अगर तुमने आज रात उसे अकेला छोड़ा, तो दुनिया को क्या मुँह दिखाओगे? और याद रखना, बिज़नेस के सारे अधिकार मेरे पास हैं। एक कदम भी इधर-उधर हुआ, तो तुम सड़क पर होगे। तुरंत घर पहुँचो!"

यही स्थिति रुद्राक्ष और देव की भी थी। विक्रांत ओबेरॉय और राघव मेहता ने साफ़ कर दिया था कि यह समझौता केवल कागजों या कुंडली तक सीमित नहीं रहेगा। भारी मन, आँखों में गुस्सा और दिल में नफरत लिए तीनों शेर वापस उसी 'पिंजरे' की ओर मुड़ गए।

जब तीनों युवक हवेली के मुख्य द्वार पर पहुँचे, तो वहाँ का नज़ारा किसी कोर्ट-रूम जैसा था। तीनों पिता सोफे पर बैठे थे, जैसे कोई बड़ी बिज़नेस डील फाइनल कर रहे हों।

राजवीर मल्होत्रा ने खड़े होकर तीनों को देखा। उनकी आवाज़ में कोई कोमलता नहीं थी। "बैठो तुम तीनों। हमें कुछ नियम तय करने होंगे।"

आरव ने चिढ़कर कहा, "नियम? क्या अब आप हमें टाइम-टेबल देंगे?"

राजवीर ने एक गहरी साँस ली और जो कहा, उसने उन तीनों के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। "हाँ। मेहर तुम तीनों की पत्नी है। लेकिन समाज और नैतिकता के नाते, वह एक समय में एक ही के साथ रहेगी। हमने तय किया है कि हर रात वह तुम में से किसी एक के लिए समर्पित होगी। आज रात... मेहर आरव के साथ रहेगी।"

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। रुद्राक्ष की आँखों में खून उतर आया। "You mean... rotational basis? Dad, क्या आप सुन रहे हैं आप क्या कह रहे हैं? वह एक इंसान है, कोई प्रॉपर्टी नहीं जिसे हम शिफ्ट में बांट लें!"

विक्रांत ओबेरॉय (रुद्राक्ष के पिता) बोले, "यह तुम्हारी सुरक्षा के लिए है रुद्राक्ष। कुंडली का दोष तभी कटेगा जब वह तुम तीनों के जीवन में पूर्णतः शामिल होगी। कल रात वह देव के पास होगी और परसों तुम्हारे पास। बहस खत्म हुई। अपने-अपने कमरों में जाओ!"

देव ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे घृणा हो रही थी—खुद से, अपने परिवार से और उस स्थिति से जिसमें उन्हें धकेला गया था।

नैना मल्होत्रा, मेहर को लेकर उस कमरे में पहुँचीं जो आरव के लिए तैयार किया गया था। मेहर को अभी तक उस 'बंटवारे' की खबर नहीं थी। उसे लगा था कि उसे अकेला छोड़ दिया जाएगा। नैना उसे बैठाकर चली गईं।

कुछ ही देर बाद, दरवाज़ा झटके से खुला। आरव अंदर दाखिल हुआ। उसकी शेरवानी के बटन खुले हुए थे और बाल बिखरे हुए थे। कमरे में मेहर को देखते ही उसका पारा चढ़ गया।

उसने मेहर की ओर बढ़ते हुए कड़वाहट से कहा, "तो... तुम यहाँ अभी तक बैठी हो? क्या इंतज़ार कर रही थी? कि मैं आऊंगा और तुम्हें अपनी बाहों में भर लूंगा?"

मेहर डरकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में आंसू थे। "नहीं... मैं तो बस..."

आरव (उसे बीच में काटते हुए): "चुप रहो! अपनी ये मासूमियत किसी और को दिखाना। मुझे पता है तुम जैसी लड़कियाँ कैसी होती हैं। दो करोड़ रुपए में तीन पति? सौदा बुरा नहीं था, है ना? तुम्हें शर्म आनी चाहिए! तुमने अपनी आत्मा बेच दी पैसों के लिए और मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी।"

मेहर का गला रुंध गया। "मैंने यह पैसों के लिए नहीं किया..."

"तो फिर क्यों किया? क्यों नहीं मना कर दिया? निकल जाओ यहाँ से! मुझे तुम्हारी शक्ल से नफरत है। मेरी नज़रों के सामने से अभी के अभी दूर हो जाओ!" आरव ने मेहर का हाथ झटके से पकड़ा और उसे दरवाज़े की ओर धकेल दिया।

मेहर का सिर दरवाज़े से टकराते-टकराते बचा। वह अपमान के घूँट पीकर उस कमरे से बाहर भाग निकली। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कहाँ जाए।

हवेली की गलियों में भटकते हुए, मेहर की नज़र आँगन में बने छोटे से मंदिर पर पड़ी। वहाँ एक दीया जल रहा था और कान्हा की मूर्ति अपनी मंद मुस्कान के साथ खड़ी थी।

मेहर वहीं घुटनों के बल बैठ गई। उसके सब्र का बाँध अब पूरी तरह टूट चुका था। वह सुबक-सुबक कर रोने लगी।

"हे कान्हा! क्या इसी दिन के लिए मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया गया था? क्या मेरा कोई वजूद नहीं? मुझे उस पाप की सज़ा क्यों मिल रही है जो मैंने किया ही नहीं? अगर मेरा दोष सिर्फ इतना है कि मेरी कुंडली में 'योग' है, तो आपने मुझे पैदा ही क्यों किया?"

उसकी आवाज़ खाली हवेली के सन्नाटे में गूँज रही थी। वह अपनी व्यथा भगवान के सामने उड़ेल रही थी। वह उन तीनों के बारे में सोच रही थी—एक जो उसे नफरत करता है, एक जो उसे बोझ समझता है और एक जो उसे देखता तक नहीं।

हवेली की पहली मंज़िल की बालकनी में देव मेहता खड़ा था। वह नीचे आँगन में हो रही हलचल को देख रहा था। उसने आरव के कमरे से मेहर को रोते हुए निकलते देखा था। और अब, वह उस लड़की को देख रहा था जो भगवान के सामने टूट चुकी थी।

देव हमेशा से एक तर्कवादी इंसान था। वह जज्बातों को बिज़नेस की तरह देखता था। पर मेहर की वह टूटी हुई आवाज़, उसकी सिसकियाँ और उसकी बेगुनाह पुकार ने देव के अंदर कुछ हिला दिया था।

उसे याद आया कि कैसे उसके पिता ने इस लड़की की बोली लगाई थी। उसे पहली बार महसूस हुआ कि मेहर इस पूरे खेल में सबसे बड़ी शिकार (Victim) है। उसने चाहा कि वह नीचे जाए और उसे सहारा दे, पर उसके पैरों में सामाजिक बेड़ियाँ थीं।

उसने एक लंबी आह भरी और खिड़की का पर्दा गिरा दिया। कमरे के अंधेरे में बैठते हुए उसने मन ही मन सोचा— "कल रात मेरी बारी है। क्या मैं भी आरव की तरह ही पत्थर बन जाऊँगा?"

अगले भाग में:

क्या होगा जब देव की 'बारी' आएगी? क्या वह मेहर का घाव भरेगा या उसे और गहरा कर देगा? और रुद्राक्ष के मन में सुलगती नफरत क्या रूप लेगी?

जुड़े रहें! 💖

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