नाश्ता लगभग खत्म हो चुका था। अनन्या ने खाली प्लेट और मग ट्रे पर वापस रख दिए। वह उठने ही वाली थी कि रियांश का हाथ उसकी कलाई पर आ गया—जला हुआ हाथ नहीं, बल्कि दूसरा। पकड़ बहुत हल्की थी, लेकिन उसमें एक अनकही गुज़ारिश थी।
“प्लीज़… मत जाओ,” रियांश की आवाज़ धीमी और भारी निकली। आँखें अभी भी थोड़ी लाल थीं। “और ठहर जाओ… थोड़ी देर और।”



















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